امام حسین علیه السلام

इमाम हुसैन (अ) और करबला
इमाम हुसैन (अ) की शहादत के बाद से मोहर्रम केवल एक महीने का नाम नहीं रह गया बल्कि यह एक दुखद घटना का नाम है, एक उसूल व सिद्धांत का नाम है और सबसे बढ़कर सच्चाई व झूठ, ज़ुल्म तथा बहादुरी की कसौटी का नाम है।
कर्बला इमाम ख़ुमैनी की नज़र में
सय्यदुश्शोहदा हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने कुछ साथियों, क़रीबी रिश्तेदारों औऱ घर की औरतों के साथ यज़ीद के ख़िलाफ़ आंदोलन चलाया। चूँकि आपका आंदोलन अल्लाह के लिये था इस लिये उस दुष्ट की हुकूमत की बुनियादें (नींव) भी हिल गईं।
इमाम हुसैन (अ) के क़ातिलों का अंजाम
शियों की मोतबर किताब कामिलुज़ ज़ियारत में ज़िक्र हुआ है कि जो लोग भी इमाम हुसैन (अ) के क़त्ल में शरीक थे, इन तीन बीमारियों में से एक में ज़रूर फँसेंगें, दीवानगी, बर्स और कोढ़।
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का जीवन परिचय
हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पिता हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम व आपकी माता हज़रत फ़तिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा हैं। आप अपने माता पिता की द्वितीय सन्तान थे।
इमाम हुसैन की ज़ियारत पर न जाने का अज़ाब
हलबी ने इमाम सादिक़ (अ) से रिवायत की है कि आपने फ़रमायाः जो भी इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत को छोड़ दे, जब कि वह इस कार्य पर सामर्थ हो तो उसने पैग़म्बरे इस्लाम (स) की अवहेलना की है।
पंद्रह मोहर्रम, हुसैनी क़ाफ़िले के साथ
"इबने ज़ियाद" एक (या कई) दिनों तक कर्बला के शहीदों के सरों को कूफ़ा शहर की गलियों कूचों और महल्लों में घुमाता रहा उसके बाद उसके पास "यज़ीद इबने मोआविया" मलऊन का आदेश आता है कि अली (अ) के बेटे इमाम हुसैन (अ) के सर को दूसरे कर्बला के शहीदों के सरों के साथ
तेरह मोहर्रम हुसैनी क़ाफ़िले के साथ
इबने ज़ियाद ने अपने दरबार में पैग़म्बर (स) के परिवार वालों का अपमान किया कभी वह हुसैन (अ) के होठों पर छड़ी मारता था तो कभी हज़रत ज़ैनब (स) से पूछता था कि बताओं को ख़ुदा ने तुम्हारे साथ किया वह कैसा था और कभी इमाम सज्जाद (अ) की बेबसी पर हसता था
बारह मोहर्रम हुसैनी क़ाफ़िले के साथ
पैग़म्बरे इस्लाम (स) के ख़ानदान पर वह बारह मोहर्रम का ही मनहूस दिन था कि जब यह लुटा हुआ काफ़िला पूरी रात कूफ़े के द्वार पर रुकने के बाद कूफ़े में पहुँचा है, इसी दिन अहलेबैत (अ) का लुटा काफ़िला कैदी बना कूफ़ा आया है। (1)
इमाम हुसैन, कर्बला, 61 हिजरी
इमाम हुसैन (अ) के साथियों और यज़ीदी सेना के बीच युद्ध जारी ही था कि ज़ोहर की नमाज़ का समय आ गया तब आपके एक साथी "अबू समाम सैदावी" ने इमाम हुसैन (अ) से कहा कि मौला ज़ोहर की नमाज़ का समय हो गया है, और हम आपकी जमाअत में अन्तिम नमाज़ पढ़ना चाहते हैं, इमाम
ग्यारह मोहर्रम हुसैनी काफ़िले के साथ
उमरे साद मलऊन ग्यारह मोहर्रम को ज़ोहर के समय तक कर्बला में रुका और उसने अपने नर्क जाने वाले साथियों और यज़ीदी सेना के मरने वालों सिपाहियों पर नमाज़ पढ़ी और उनको दफ़्न किया, लेकिन पैग़म्बर (स) के बेटे को दफ़्न करना किसी को गवारा नहीं हुआ और वह हुसैन (अ) जो
दस मोहर्रम हुसैनी क़ाफ़िले के साथ
सुबह की नमाज़ के बाद इमाम हुसैन (अ) ने अपनी सेना को व्यवस्थित करना आरम्भ किया आपने ख़ैमों के सामने अपनी सेना को जिसमें 32 घुड़सवार और 40 पैदल सैनिक थे को तीन हिस्सों में बांटा, और दाहिने भाग के लिये "ज़ोहैर इबने क़ैन" को सेनापति बनाया,
आशूर की रात को इमाम हुसैन के एक साथी "मोहम्मद बिन बशीर हज़रमी" को सूचना दी गई की तुम्हारा बेटा शत्रु के सेना के हाथों "रय" शहर की सीमा पर गिरफ़्तार हो गया है उन्होंने उत्तर में कहाः उसपर और मुझ पर पड़ी इस मुसीबत के सवाब की मैं ईश्वर से आशा रखता हूँ और मुझ
नवीं मोहर्रम हुसैनी क़ाफ़िले के साथ
शिम्र इमाम हुसैन (अ) के ख़ैमों के पास आया और उसने हज़रत उम्मुल बनीन के बेटो हज़रत अब्बास, अब्दुल्लाह, जाफ़र और उस्मान को बुलाया, यह लोग बाहर आये तो उसने कहा कि मैंने तुम लोगों के लिये इबने ज़ियाद के अमान ले ली है। सभी ने कहाः ईश्वर तुम्हारी अमान और...
इमाम ज़माना की नज़र में हज़रत अब्बास का मक़ाम
सलाम हो अबुल फ़ज़्ल पर, अब्बास अमीरुल मोमिनीन के बेटे, भाई से सबसे बड़े हमदर्द जिन्होंने अपनी जान उन पर क़ुरबान कर दी, और गुज़रे हुए कल (दुनिया) से आने वाले कल (आख़ेरत) के लिये लाभ उठाया, वह जो भाई पर फ़िदा होने वाला था, और जिसने उनकी सुरक्षा की और...
आठवी मोहर्रम हुसैनी क़ाफ़िले के साथ
उमरे साद ने सर झुका लिया और कहाः हे हमदानी मैं जानता हूँ कि इस ख़ानदान को दुख देना हराम है, मैं एक बहुत ही भावनात्मक मोड़ पर हूँ मैं नहीं जानता कि मुझे क्या करना चाहिए, रय की हुकूमत को छोड़ दूँ? वह हुकूमत जिसके शौक़ में मैं जल रहा हूँ...
 सातवीं मोहर्रम हुसैनी क़ाफ़िले के साथ
मोहर्रम की सातवीं तारीख़ को "उबैदुल्लाह बिन ज़ियाद" ने एक पत्र लिखकर "उमरे साद" को आदेश दिया कि वह अपने सिपाहियों के लेकर जाए और हुसैन एवं फ़ुरात के बानी के बीच रुकावट बनके पानीं को हुसैन और उनके बच्चों तक पहुंचने से रोके और, सचेत रहे कि किसी भी अवस्था मे
छठी मोहर्रम हुसैनी क़ाफ़िले के साथ
बीब रात के अंधेरे में बनी असद के पास पहुँचे और फ़रमायाः मैं तुम्हारे लिये बेहतरीन उपहार लाया हूँ, मैं तुम को अल्लाह के रसूल के बेटे की सहायता की निमंत्रण देता हूं, उनके पास वह साथी हैं जिनमें से हर एक हज़ार लड़ाकों से बेहतर है और वह कभी भी उनके अकेला नहीं
इमाम हुसैन (अ.) कौन थे
सभी मुसलमान इस बात पर सहमत हैं कि कर्बला के महान बलिदान ने इस्लाम धर्म को विलुप्त होने से बचा लिया! हालांकि, कुछ मुसलमान इस्लाम की इस व्याख्या से असहमत हैं और कहते हैं की इस्लाम में कलमा के "ला इलाहा ईल-लल्लाह" के सिवा कुछ नहीं है!
पाँचवी मोहर्रम हुसैनी काफ़िले के साथ
चार मोहर्रम को कूफ़े की मस्जिद में इब्ने जियाद के ख़ुत्बे का असर यह हुआ की बहुत से लोग इमाम हुसैन (अ.) से युद्ध करने के लिये तैयार हो गए और पाँचवी मोहर्रम को उबैदुल्लाह बिन ज़ियाद ने “शबस बिन रबई” (1) नामक एक व्यक्ति को 1000 की सेना के साथ करबला...
चौथी मोहर्रम हुसैनी क़ाफिले के साथ
“हे लोगों! तुम लोगों ने अबू सुफ़ियान के ख़ानदान को आज़माया और जैसा तुम चाहते थे उनको वैसा पाया! यज़ीद तो तुम पहचानते हो वह अच्छे व्यवहार वाला, नेक और अपने नीचे काम करने वालों पर एहसान करने वाला और उनकी अताएं बजा हैं! और उनका बाप भी ऐसा ही था! अब यज़ीद ने

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