एक ईरानी का ग़ाज़ा में 23 साल से जारी है इस्राईल के विरुद्ध संघर्ष

एक ईरानी 1994 में यासिर अराफात के साथ गाजा पहुँचता है क्योंकि वह फिलिस्तीनियों के साथ रहना चाहता था।

 

80 वर्षीय कासिम अलशियासी 23 साल से गाजा में रहते हैं और वर्षों से इस्लामी प्रतिरोध का साथ दे रहे हैं।

इस दौरान उन्होंने खान यूनुस में तीन शादियां भी हैं, लेकिन अब फिलीस्तीनी अधिकारियों की अनदेखी की वजह से जो कभी लेबनान और यमन में उनके सहयोगी हुआ करते थे, कठोर परिस्थितियों में जीवन गुजार रहे हैं।

उन्होंने अपने जीवन की कहानी कुछ यूं सुनाई है: मैं फिलीस्तीनी जनता का प्रेमी हूँ, और उनके समर्थन के लिए लेबनान में फिलिस्तीनी सेना में शामिल हुआ और कमांडर अबू अम्मार के नीचे कार्य किया,  जब वह 12 साल के लिए यमन गए, मैं भी उनके साथ चला गया और उनके साथ बहुत खुश था, और मेरी आर्थिक स्थिति भी अच्छी थी।, तीन शादियां की थीं, लेकिन अबू अम्मार जाने से सब कुछ बदल गया। और एक सैनिक एक आम आदमी बनकर रह गया जिसका कोई घर नहीं हो, और ईरानी होने की वजह से मेरी आवाज किसी ने नहीं सुनी।

इतने साल गाजा में रहने के बाद भी उनका लहजा ईरानी ही है और लोग मुश्किल  ही से उनकी बात समझते हैं।

उनके के चेहरे से दर्द झलकता है। उनका कहना है कि: मैं चाहता हूँ अपने देश वापस जाना चाहता हूँ, मेरे बीवी-बच्चे वहाँ हैं, मै बीमार हूँ।

उनकी 50 वर्षीय दूसरी पत्नी नामा अलशियासी ने उनके बारे में बताया कि 23 साल पहले उन्होंने खैरियह शियासी शादी की थी, और उनके इस एक बेटी हुई जिसे कैंसर था, 18 साल बाद मुझसे शादी की और एक बेटा हुआ, फिर तीसरी शादी की और दो बेटे हुए। हम सब एक ही घर में रहते थे। 2008 में इजरायल हमले में हमारा घर तबाह हो गया था, और मेरे पति के ईरानी होने की वजह से हमें कोई सहायता नहीं दी गई और अब हम एक किराए के घर में रहते हैं।

उन्होंने कहा: यह इलाका रहने के लिए उपयुक्त नहीं है क्योंकि यह कचरा फेंकने की जगह है। 60 साल की खैरियह शियासी, डिप्रेशन की मरीज़ हैं। वह कहती हैं हमें कोई पेंशन नहीं मिलती है हमारे कुछ खर्च, कुछ राहत संस्था देते हैं। जब मुझे कैंसर हुआ तो किसी ने मेरी सहायता नहीं की। मेरे पति, ईरान जाने की बातें करते हैं और वहाँ के अच्छी जीवन के बारे में हमें बताते रहते हैं।

यासिर अराफात की मौत के बाद उनकी मासिक 600 डॉलर की सहायता को फिलीस्तीनी न होने की वजह से बंद कर दिया गया था, इससे हमारे जीवन अच्छी गुज़रती थी, लेकिन इसके बंद होने के बाद हम अब सब चीजों से वंचित हो गए हैं ।

उनकी मानसिक हालत बुरी है और कहते हैं कि दिल करता है कि अराफात की कब्र पर जाकर कि उनसे कहूं कि मैं मर रहा हूँ और किसी को कोई परवाह नहीं है।

शियासी ने ईरान में अपने बीवी बच्चों को छोड़ा ताकि फिलीस्तीन में जिहाद कर सकें।

वे कहते हैं कि: मैं पहले अपने परिवार से संपर्क में था और उनसे वादा करता था कि उनसे मिलने जरूर जाऊंगा लेकिन फिलीस्तीनी न होने की वजह से भी वंचित हो गया हूँ। अब मेरा अपने ईरान में घर वालों से कोई संपर्क नहीं है, उन्हें पता तक नहीं है कि मैं ज़िंदा हूँ या मर गया हूँ।

उन्होंने अंत में कहा: मैं अब अपने देश जाना चाहता हूँ, मैं गुर्दे और हड्डियों के बीमार हूँ, और इलाज के लिए अपने देश वापस जाना चाहता हूँ।