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फ़ातेमा ज़हरा
फ़ातेमा एक बेटी थीं, एक ऐसी बेटी जिनकी कोई मिसाल नहीं है। शिष्टाचार के शिखर पर विराजमान, पवित्रता और गुणों से सुसज्जित। वे रचना और इंसानियत की पहेली का रहस्य थीं। उनकी उपाधी उम्मे अबीहा अपने बाप की मॉ की, यह उपाधी पैग़म्बरे इस्लाम ने उन्हें प्रदान किया था
उम्मुल बनीन
यह एक तरह का चिल्ला है जो किताबे “इल्मे जिफर” में लिखा है जिस को नमाज़े सुबह के बाद या फिर नमाज़े इशा के बाद या अगर महीने के अरम्भ में करे तो सब से अच्छा है ।
उम्मुल बनीन का मज़ार
जनाबे उम्मुल बनीन (स.अ) के पिता हज़्ज़ाम बिन ख़ालिद बिन रबी कलाबिया थे तथा आप को अरब के प्रसिद्ध बहादुरों मे गिना जाता था एवं अपने क़बीले के सरदार भी थे और आपकी माता का नाम तमामा था।
उम्मुल बनीन की वफ़ात
रिवायत में आया है कि अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम ने हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाहे अलैहा की शहादत के बाद अपने भाई अक़ील से जो कि अरब के नसबों और उनके जीवन को बहुत अच्छी तरह से जानते थे फ़रमायाः मैं चाहता हूँ कि आप मेरे लिए किसी ऐसी महिला को तलाश करें जो..
वीमेंस डे
इमाम खु़मैनी साहब की बीवी कहती हैं कि, ख़ुमैनी साहब जब भी सलात-उल-लैल(नमाज़े शब) के लिए उठते थे,तो मुझे पता नहीं चलता था क्योंकि मेरे आराम की ख़ातिर वह लाईट नहीं जलाते थे, वज़ू करने जाते थे तो नल के नीचे एक फ़ोंम(स्पंज) रख देते थे, ताकि पानी की आवाज़ से म
या ज़ैनब
इंसान जब दुनिया में आता है तो उसके पास न इल्म होता है और न तजुर्बा। जैसे-जैसे ज़िन्दगी की कठिनाईयों से गुज़रता है इल्म व तजुर्बे की वजह से उसके अंदर कमाल पैदा हो जाता है। वैसे तो इंसान के नेचर में यह बात पाई जाती है कि वह कमाल चाहता है
वहाबियत की सच्चाई
मुसलमान वही है जो दूसरो कि सहायता करता है, यहीं से ये बात भी समझ में आती है कि मुसलमान किसी को नुक़सान नही पहुँचाता, अब अगर कोई किसी को नुक़सान पहुँचाकर ये समझता रहे कि वो मुसलमान है तो ये ग़लत है, इस हदीस के आधार पर वो मुसलमान नहीं हो सकता।
शहादते हज़रत ज़हरा
आज पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के सुपुत्री हज़रत फ़ातेमा सलामुल्लाह अलैहा की शहादत की तिथि है। हज़रत फ़ातेमा सलामुल्लाह अलैहा वह हस्ती हैं जिन्होंने महानता व परिपूर्णता का मार्ग अत्यधिक उचित ढंग से तय किया और संसार वासियों के लिए मूल
हज़रत फ़ातेमा ज़हरा आदर्श बेटी, माँ और पत्नी
नौ वर्ष की आयु तक हज़रत फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा अपने पिता के घर पर रहीं।जब तक उनकी माता हज़रत ख़दीजा जीवित रहीं वह गृह कार्यों मे पूर्ण रूप से उनकी साहयता करती थीं। तथा अपने माता पिता की अज्ञा का पूर्ण रूप से पालन करती थीं
फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाहे अलैहा का जीवन परिचय
हज़रत फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा के पिता पैगम्बर हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा व आपकी माता हज़रत ख़दीजातुल कुबरा पुत्री श्री ख़ोलद हैं। हज़रत ख़दीजा वह स्त्री हैं,जिन्होने सर्व- प्रथम इस्लाम को स्वीकार किया। आप अरब की एक धनी महिला थीं तथा आप का व्यापार पूरे अरब मे
 हज़रत फ़ातेमा ज़हरा की फ़ज़ीलतें अहले सुन्नत की किताबों से
रसूले की इकलौती बेटी और इमामत एवं रिसालत को मिलाने वाली कड़ी, वह महान महिला जिसकों सारी दुनियां की औरतों का सरदार कहा गया, रसूल जिसका इतना सम्मान करते थे कि आपने म्मेअबीहा यानी अपने बाप की मां कहा, इमामत की सुरक्षा में शहीद होने वाली पहली महिला, वह महिला
अमोनिया गैस प्लांट
लेबनान के हिज़्बुल्लाह संगठन के महासचिव ज़ायोनी शासन के ख़िलाफ़ एक नई परमाणु रणनीति तैयार कर रहे हैं।
फ़िलिस्तीन का तीसरा इन्तिफ़ाज़ा
फ़िलिस्तीनियों पर इस्राईली अत्याचार के विरुद्ध जारी प्रतिरोध और फ़िलिस्तीन के तीसरे इन्तेफ़ादा (क्रांति) के बारे में अरब देशों के साथ साथ विश्व कि भिन्न देशों ने अलग अलग प्रतिक्रियाएं दी हैं।
सन 1979 में ईरान में क्रांति सफल हुई और ढाई हज़ार साल से जारी राजशाही का अंत हो गया, लेकिन इस राजशाही के अंत के साथ ही अमरीका और इस्राईल के लिए ईरान नामक "दुधारू गाय" ने दूध देना भी बंद कर दिया।
सही बुख़ारी
अगर मान भी लिया जाए कि बीबी ज़हरा कुछ समय के लिए शेख़ैन नाराज भी हुईं थीं, लेकिन यह भी अपने स्थान पर साबित है कि बीबी ज़हरा के जीवन के अंतिम दिनों में शेख़ैन बीबी के पास आए और उनसे क्षमा मांग कर उन्हें प्रसन्न कर लिया था, जैसा कि बयाकी और दूसरों ने नकल कि
ट्रंप
जर्मनी के एस समाचार पत्र ने ट्रंप द्वारा सात मुसलमान देशों के नागरिकों के अमरीका में प्रवेश पर प्रतिबंध अरब देशों की चुप्पी और उसके विरुद्ध कुछ पूरोपीय देशों की प्रतिक्रिया रिपोर्ट पेश की है।
ख़ुत्ब ए ग़दीर
ग़दीर का पूरा ख़ुत्बा, मौज़ूआत के साथ
तीसरा ख़लीफ़ा कौन?
अल्लाह के शहर मक्के में मैं टहल रहा था कि देख कुछ वहाबी मेरी तरफ़ आ रहे हैं मैं समझ गया कि कोई चक्कर है, वह मेरे पास आए और कुछ सवाल जवाब के बाद पूछाः बताओ पहला ख़लीफ़ा कौन है? मैं: हज़रत अबू बक्र। वहाबीः शाबाश। दूसरा ख़लीफ़ा कौन है? मैं: हज़रत उमर
रफसंजानी
इसमें कोई संदेह नहीं है कि हाशमी रफसंजानी ईरान की इस्लामी क्रांति के बाद ईरानी राजनीतिक के बहुत बड़े खिलाड़ी रहे हैं जिनकी सियासत इस प्रकार की रही है कि हमेशा लोग उनके समर्थन या फिर विरोध में खड़े दिखाई देते है, क्योंकि उनकी सिसायत का सबसे बड़ा पहलू यह है
ग़दीर का संदेश
१८ ज़िलहिज्जा सन दस हिजरी क़मरी को पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने ईश्वर के आदेश पर हज़रत अली अलैहिस्सलाम को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। आज ही के दिन पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने

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