عرفان اسلامی

يَا مُمْتَحَنَةُ امْتَحَنَكِ اللَّهُ الَّذِي خَلَقَكِ قَبْلَ أَنْ يَخْلُقَكِ فَوَجَدَكِ لِمَا امْتَحَنَكِ
يَا مُمْتَحَنَةُ امْتَحَنَكِ اللَّهُ الَّذِي خَلَقَكِ قَبْلَ أَنْ يَخْلُقَكِ فَوَجَدَكِ لِمَا امْتَحَنَكِ
इमाम रज़ा (अ.) की मार्गदर्शक हदीसें
रिवायत में आया है कि अहलेबैत ने फ़रमाया कि हमारी हदीसों और कथनों को सुनों और दूसरों को सुनाओ क्योंकि यह दिलों को रौशन करती हैं।
शियों के लिए इमाम रज़ा (अ.) का संदेश
हे अब्दुल अज़ीम मेरी तरफ़ से मेरे दोस्तों के यह संदेश देना और उनसे कहना कि शैतान को स्वंय पर नियंत्रण ना करने दें और उनको आदेश देना कि बोलने और अमानत में सच्चाई रखें, और जो चीज़ उनके काम की ना हो उसमें ख़ामोश रहें, आक्रमकता को छोड़ दें, एक दूसरे के क़रीब
सैरो तफ़रीह इमाम रज़ा (अ.) की निगाह में
इस दुनिया में हर व्यक्ति को सैर, तफ़रीह और ख़ुशी की आवश्यक्ता होती है हर इन्सान अपने जीवन में प्रसन्न रहना चाहता है और अगर यह सैर, तफ़रीह और प्रसन्नता अपनी हद से आगे ना निकल जाए और इन्सान किसी गुनाह और पाप में ना पड़ जाए तो यह इन्सान के लिए बहुत ही सुखद ह
पैग़म्बरे अकरम (स.) की भविष्यवाणी
पैग़म्बरे अकरम ने फ़रमाया कि मेरे बाद जब दनिया में....
इमाम हसन (अ) की हदीसें
निःसंदेह सबसे अधिक देखने वाली आखें वह है जो नेक रास्ते को देख लें, और सबसे अधिक सुनने वाले कान वह हैं जो नसीहत सुने और उसने फ़ायदा उठाएं, सबसे स्वस्थ दिल वह हैं जो संदेह से पवित्र हो।
इमाम हुसैन (अ) महात्मा गाँधी की नजर में
महात्मा गाँधी ने लोगों को अहिंसा का पाठ पढ़ाया क्यों कि वह जानते थे कि जो काम अहिंसा कर सकती है वह हिंसा से नहीं हो सकता है वह जानते थे कि अगर हिंसा में जीत होती हो आज से 1400 साल पहले कर्बला के मैदान में यज़ीद जीत गया होता और इमाम हुसैन हार गए होते।
माँ, बाप, अल्लाह, पेट और पड़ोसी का हक़ चौथे इमाम की नज़र में
इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.) ने फ़रमाया: अल्लाह का तुम पर हक़ यह है कि उसकी आराधना करो और किसी चीज़ को उसका साथी न बनाओ, और अगर सच्चे दिल से यह किया तो अल्लाह ने वादा किया है कि वह तुम्हारे दुनिया और आख़ेरत के कार्यों को पूरा करे और जो तुम उसस चाहो वह तुम्हारे
आमाले आशूरा
इसके बाद दो रकअत नमाज़े ज़्यारते आशूरा सुबह की नमाज़ की तरह पढ़े फिर दो रकअत नमाज़, ज़्यारते इमाम हुसैन अ. इस तरह कि क़ब्रे इमाम हुसैन अ. की तरफ़ इशारा करे और नियत करे कि दो रकअत नमाज़े ज़्यारत इमाम हुसैन अ. पढ़ता हूँ क़ुरबतन इलल्लाह नमाज़ तमाम करने के बा
मुहर्रम महत्वपूर्ण दिन और आमाल
मोहर्रम की पहली क़मरी साल का पहला दिन है। इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ) से रिवायत हैः जो भी इस दिन रोज़ा रखे, ईश्वर उसकी प्रार्थना को स्वीकार करता है, जिस प्रकार उसने ज़करिया (अ) की दुआ को क़ुबूल किया। (8)
मस्जिद कूफ़ा की फ़ज़ीलत
पैग़म्बरे इस्लाम (स) जब मेराज पर जा रहे थे तो जिब्रईल ने उनसे कहाः हे अल्लाह के रसूल (स) क्या आप जानते हैं कि आप अभी कहां हैं? आप मस्जिदे कूफ़ा के पास हैं, आपने फ़रमायाः मेरे ख़ुदा से अनुमति लो
हमेशा बाक़ी रहने वाली नेकी
नेकी और भलाई यह नहीं है कि तुम्हारे पास अधिक दौलत और औलाद हो, बल्कि भलाई ज्ञान और इल्म की अधिकता और अमल एवं व्यवहार अच्छा होने में है, और यह इन्सान के धैर्य एवं विवेक से सम्बंधित है,
दुआ ए अरफ़ा इमाम हुसैन
फिर आपने अपने चेहरे और आँखों को आसमान की तरफ़ उठाया और आपकी दोनों आँखों से दो मश्कों की तरह आँसू जारी थे फिर आपने बुलंद आवाज़ में कहाः
हज़रत यूसुफ़ और ज़ुलैख़ा की आशिक़ी 1
हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम, अज़ीज़े मिस्र के घरे में पले-बढ़े और व्यस्कता के चरण तक पहुंचे और फिर ज्ञान व तत्वदर्शिता से संपन्न हुए। उनके सुंदर व तेजस्वी चेहरे ने अज़ीज़े मिस्र को वशीभूत कर लिया था और उसकी पत्नी ज़ुलैख़ा भी उन्हें चाहने लगी थी
हज़रत यूसुफ और जुलैख़ा की आशिक़ी 2
राजा ने यूसुफ़ को आज़ाद करने का आदेश दिया लेकिन हज़रत यूसुफ़ ने कहा कि वे उस समय आज़ाद होना पसंद करेंगे जब उन पर लगे आरोपों की जांच हों और वे निर्दोष साबित हो जाएं। अंततः ज़ुलेख़ा ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया और कहा, अब सत्य सिद्ध हो चुका है, मैंने काम व
इमाम सज्जाद की दुआ ए अरफ़ा
यह दुआ इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम की दुआओं की प्रसिद्ध किताब सहीफ़ए सज्जादिया की 47वीं दुआ है जिसकों इमाम (अ) ने अरफ़ा के दिन पढ़ा है इसलिये मोमिनों को चाहिए कि इस दिन बहुत अधिक समय दुआ और तौबा व इस्तेग़फ़ार में बिताएं और यह दुआ पढ़ें