इमाम रज़ा (अ.) की मार्गदर्शक हदीसें

इमाम रज़ा (अ.) की मार्गदर्शक हदीसें
रिवायत में आया है कि अहलेबैत ने फ़रमाया कि हमारी हदीसों और कथनों को सुनों और दूसरों को सुनाओ क्योंकि यह दिलों को रौशन करती हैं।

बुशरा अलवी
 

जैसा कि रिवायत में आया है कि अहलेबैत ने फ़रमाया कि हमारी हदीसों और कथनों को सुनों और दूसरों को सुनाओ क्योंकि यह दिलों को रौशन करती हैं।

आज जब्कि इमाम रज़ा (अ) के जन्मदिन की तारीख़ें चल रही हैं तो आइये हम और आप इमाम रज़ा (अ) के पास चलते हैं और उनके सदाचार एवं अख़लाक़ के पाठ में समिलित होते हैं, क्यों कि अगर आप आज होते तो हम लोगों से यही फ़रमाते जो आज आपकी हदीसें और कथन हमसे कह रहे हैं।

इमाम रज़ा (अ) की दस हदीसें हम आपके सामने प्रस्तुत कर रहे हैं

1. قال الرضا (ع) : مَن لم يقدر على ما يكفّر به ذنوبه، فليُكثر من الصلاة على محمد وآله ، فإنها تهدم الذنوب هدماً و قال الصلوات علی محمد و الہ تعدل عند اللہ عزوجل التسبیح و التھلیل و التکبیر

इमाम फ़रमाते हैं: जो भी अपने पापों और गुनाहों का प्राश्चित नही कर सकता है (अपनी जवानी के दिनों में किसी ने कुछ पाप किए लेकिन अब उनका प्राश्चित नही कर सकता, किसी का हक़ था खा लिया अब उसको वापस नही दे सकता, किसी नामहरम पर निगाह डाल दी ख़ुदा के हक़ को रौंद दिया) तो वह क्या करे? आप फ़रमाते हैं कि उसको मोहम्मद और आले मोहम्मद (आपके परिवार वालों) पर सलवात पढ़नी चाहिए यह सलवात इन पापों को समाप्त कर देती हैं उनको जड़ से उखाड़ देती है फिर आप फ़रमाते हैं कि ख़ुदा के नज़दीक इस सलवात का दर्जा तसबीह, (सुबहान अल्लाह) तहलील (अलहम्दोलिल्लाह) और तकबीर (अल्लाहो अकबर) के बराबर है।

۲۔ من لقی فقیرا مسلما فسلم علیہ خلاف سلامہ علی الغنی لقی اللہ عزوجل یوم القیامۃ و ھو غضبان

इमाम रज़ा (अ) फ़रमाते हैं कि अगर किसी फ़क़ीर से किसी की भेंट हुई और उसको सलाम किया तो अगर उसका इस फ़क़ीर को सलाम किसी अमीर के सलाम से भिन्न हुआ तो क़यामत के दिन ख़ुदा से मुलाक़ात करेगा इस हालत में कि ख़ुदा उससे क्रोधित होगा।

क्योंकि वह हमसे प्रश्न करेगा कि क्यों तुमने लोगों के बीच भेदभाव किया? अगर वह फ़क़ीर हुआ और दूसरा अमीर तो यह सब ख़ुदा की करनी है, ख़ुदा ने उनको ऐसा बनाया है। याद रखों के फ़क़ीरी और माल दोनों ही इम्तेहान हैं।

इस्लाम में लोगों के बीच बरतरी केवल तक़वे और परहेज़गारी के आधार पर है। इस्लाम ने रंग, नस्ल, माल... आदि को उच्चता का प्रतीक नहीं माना है।

एक हदीस में आया है कि सलमान को सलमान हम अहलेबैत में से हैं इसलिए कहा गया क्योंकि वह समाज के ग़रीब लोगों के साथ मिलते जुलते थे उनके साथ उठते बैठते थे।

आगे एक रिवायत आएगी जिसमें ख़ुद इमाम रज़ा (अ) ने दिखाया है कि समाज के निचले तबक़े के साथ किस प्रकार व्यवहार किया जाता है, रिवायत में है कि जब दस्तरख़ान बिछाया गया तो पूछने वाले ने पूछा कि आप इन सूडानियों (काले लोगों) के साथ क्यों एक दस्तरख़ान पर बैठते हैं? आप यह सुनकर क्रोधित हो गए आपने फ़रमाया किः हमारे माता पिता एक हैं हम सब आदम और हव्वा की औलाद हैं, हस सब ख़ाली हाथ इस दुनिया मे आए हैं और ख़ाली हाथ ही चले जाएंगे,  उच्चता यह नही है कि कहां के हो, किस नस्ल के हो बल्कि सम्मान तो इसमें है कि तुम्हारा तक़वा कैसा है।

۳۔ عن ابی الصلت الھروی قال سالت الرضا عن الایمان فقال: الایمان عقد بالقلب و لفظ باللسان و عمل بالجوارح، لا یکون الایمان الا ھکذا

अबी सलत हेरवी कहते हैं कि मैने इमाम (अ) से ईमान के बारे में प्रश्न किया इमाम रज़ा (अ) ने फ़रमाया किः इमान की तीन क़िस्में हैं और इन तीनों को एक साथ होना चाहिए।

1. दिल से ईमान का होना।

2. ईमान का अपनी ज़बान से इज़हार होना चाहिए।

3. अमल होना चाहिए, ईमान के अनुसार तुम्हारे कार्य होना चाहिए।

और ईमाम, ईमान नही है मगर यह की यह तीनों चीज़ें एक साथ हों।

۴۔ من زارنی علی بعد داری اتیتہ یوم القیامۃ فی ثلاثۃ مواطن حتی اخلصہ من اھوالھا، اذا تظایرت الکتب یمینا و شمالا و عند الصراط و عند المیزان

इमाम रज़ा (अ) फ़रमाते हैं किः अगर कोई इस दूरी में आकर मेरी ज़ियारत करे तो मैं तीन स्थानों पर उसकी सहायता करूँगा, और इन तीन मुसीबतों से नजात दिलाऊँगा (वह मुसीबत जिसमें हर कोई हर एक से दूर भागेगा माँ बेटे से, बेटा पाप से, भाई भाइ से यानी कोई किसी की सहायता करने वाला नही होगा उस समय मैं इमाम रज़ा (अ) तुम्हारी सहायता करूँगा और तुमको इस परेशानी से नजात दिलाऊँगा) वह तीन स्थान यह हैं:

1.जब तुम्हारे नामा ए आमाल तुम्हारे दाहिने और बांए हाथ दिये जाएंगे।

जब यह कहा जाएगा कि ऐ तुम लो यह तुम्हारे कार्यों का नतीजा यह तुम्हारा नामा ए आमाल है उस समय एक कार्यो होगा जो हमारी सहायता करेगा और वह होगा हमारी इमामे रज़ा (अ) की ज़ियारत।

2. पुले सिरात पर। कौन सा पुल? वह पुल जिसके बारे में कहा जाता है कि तलवार की धार से अधिक देज़ और बाल से अधिक बारीक होगा जहाँ हमारे पैरों के नीचे नर्क होगा।

3. जब तुम्हारे कार्यों का आंकलन किया जाएगा।

۵۔ لا یجتمع المال الا بخصال خمس ببخل شدید، و امل طویل، و حرص غالب  و قطیعه الرحم  و ایثار الدنیا علی الاخره

इमाम रज़ा (अ) फ़रमाते हैं कि किसी के भी पास माल एकत्र नहीं हो सकता मगर यह कि उसके अंदर पाँच (बुरे) गुण हों:

1. बहुत अधिक कंजूस हो। केवल जमा करने के चक्कर में पड़ा रहे।

एक रिवायत में आया है कि हज़रत अली (अ) एक क़ब्रिस्तान में गए और वहां आपने अपने साथियो की तरफ़ देख कर उन मुर्दों से कहाः तुम्हारे घरों में दूसरे लोग रहने लगे, तुम्हारी औरतों ने शादियां कर लीं, तुम्हारा माल बट गया, यह हमारे पास तुम्हारे लिए समाचार थे। लेकिन तुम्हारे पास हमारे लिए क्या सूचना है? फिर इमाम अली (अ) ने फ़रमाया कि अगर इनको बोलने की अनुमति दी जाती तो वह यह कहतेः जो हमने खाया उसको खाया, जो कार्य करके अपनी आख़ेरत के लिए भेज दिये हम उनको देख रहे हैं और जो हमने दुनिया में छोड़ दिया उसका हिसाब दे रहे हैं।

तो अगर इन्सान को दौलत चाहिए तो उसके अंदर तीव्र प्रकार की कंजूसी होनी चाहिए, ऐसा होना चाहिए कि उसके सामने एक बीमार बिना इलाज के मरता रहे लेकिन उसपर कोई फ़र्क़ ना पड़े।

2. लम्बी लम्बी आरज़ूएं होना चाहिए।

आज जब्कि इन्सान को यह तक नहीं पता है कि कल क्या होगा वह जीवित भी रहेगा या नहीं रहेगा, फिर कैसी आरज़ू? करोड़ो चीज़ें कारण बनती हैं तब कहीं जाकर इन्सान सांस ले पाता है अगर इनमें से कोई एक भी कम हो जाए तो हमारी मौत हो जाएगी, आज आश्चर्य इन्सान की मौत पर नही होना चाहिए बल्कि आश्चर्य तो इन्सान के जीवित रहने पर होना चाहिए, कि किस प्रकार ख़ुदा ने इस सारी चीज़ों को एक लाइन में लगाया है ताकि इन्सान जीवित रह सके।

3. बहुत अधिक लालची हो।

4. अपने रिश्तेदारों से सम्बन्ध को तोड़ ले।

क्योंकि अगर ऐसा नहीं करेगा तो उसको अपनों के ग़मों में शरीक़ होना पड़ेगा उनकी आवश्यक्ता के समय ख़र्च करना पड़ेगा।

5. अपनी दुनिया के लिए आख़ेरत की बलि दे दे।

कहा गया है कि बहुत अधिक पैसा जमा करने के चक्कर में ना पड़ो अगर तुम को ख़ुदा पर भरोसा है तो जिस प्रकार कड़ाके की ठंड में जमी हुई बर्फ़ के बीच एक चिड़या को दाना मिल जाता है वैसे ही तुम्हारी रोज़ी भी तुमको मिल जाएगी।

۶۔ من علامات الفقہ: الحلم و العلم و الصمت انّ الصمت باب من ابواب الحكمة انّ الصمت يكسب المحبة، انہ دليل على كل خير  

फ़क़ीह और दीनदार इन्सान की निशानियाँ

1. हिल्म और सब्र होना चाहिए।

जो चीज़ समस्याओं को हल करती है या दुआ को क़ुबूल करवाती है वह है धैर्य रखना। आप एक अपाहिज व्यक्ति को देखिए कि अगर वह अपनी इस हालत पर सब्र कर ता है तो एक दिन वह दुनिया के सामने कामियाब होता है।

2. इल्म और ज्ञान।

यानी जो भी कार्य करता है उसके पास उस कार्य के लिए तर्क होता है क्यों यह खाया क्यों यह कपड़ा पहना आदि सब कुछ तर्क के अनुसार करता है।

3. ख़ामोशी। ख़ामोशी हिकमत के द्वारों में से एक द्वार हैं।

क्योंकि जो ख़ामोंशी रखता है वह सुनता है और सोंच की शक्ति पैदा करता है और यह दोनों चीज़ें वह हैं जो इन्सान को हिकमत तक पहुँचाती है। ख़ामोशी हर नेकी और अच्छे कार्य की कुंजी है।

ख़ामोशी दूसरो की मोहब्बत को लाती है और यह सदैव याद रखिए कि ईश्वर ने हमको दो कान दिये हैं जब्कि जीभ केवल एक दी है इसलिए हमको सुनना अधिक चाहिए और बोलना कम चाहिए।

7.ان اللہ عزوجل امر بثلاثہ، مقرون بھا ثلاثۃ اخر: امر بالصلاۃ و الزکاۃ فمن صلی و لم یزک لم تقبل منہ صلاتہ، و امر بالشکر لہ و للوالدین، فمن لم یشکر والدیہ لم یشکر اللہ، و امر باتقاء اللہ و صلۃ الرحم، فمن لم یصل رحمہ لم یتق اللہ عزوجل۔

इमाम रज़ा (अ) फ़रमाते हैं: ईश्वर ने क़ुरआन में तीन चीज़ों के बारे में कहा है दूसरी तीन चीज़ों के साथ फिर आप फ़रमाते हैं: यह तीन चीज़ें जो कि दो दो के जोड़े में हैं बिना एक के दूसरी स्वीकार्य नहीं हैं।

1. ईश्वर ने फ़रमाया नमाज़ पढ़ों और ज़कात दो।

अब अगर कोई नमाज़ तो पढ़े लेकिन ज़कात ना दे तो उसकी नमाज़ भी स्वीकार्य नही है। (इस्लामी क़ानून के हिलाज़ से भी ऐसा ही है क्योंकि अगर कोई ज़कात ना दे तो उसका पैसा हराम होगा और हराम पैसे से वह वज़ु आदि करेगा कपड़े लेगा और इस हराम पैसे से ली गई चीज़ों में नमाज़ सही नही है।)

2. और ईश्वर ने आदेश दिया है कि धन्यवाद करों ईश्वर का और अपने माता पिता का।

ख़ुद क़ुरआन में ख़ुदा फ़रमाता हैः وَقَضَى رَبُّكَ أَلاَّ تَعْبُدُواْ إِلاَّ إِيَّاهُ وَبِالْوَالِدَيْنِ إِحْسَانًا सूरा असरा आयत 23

प्रिय पाठकों याद रखिए आज हमारे जीवन में जो बहुस सी समस्याएं हैं उनका कारण माता पिता का अपनी औलात के लिए दुआ ना करने और उनको आक़ (बेदख़ल) करने के कारण है।

याद रखिए यह बूढ़े लोगों के लिए अलग घर होना या जिसको हम वृद्धों का आश्रम कहते हैं यह इस्लाम की शिक्षा नही है।

इस्लाम की शिक्षा यह है कि रिवायत में आया है कि एक क़साई मूसा (अ) के दर्जे तक पहुँच गया। क्यों? क्योंकि वह अपने बूढ़े माता पिता की सेवा करता था। तो इस्लाम यह कहता है कि अपने माता पिता की सेवा करो जिस प्रकार उन्होंने तुम्हारे बचपन में तुम्हारी सेवा की थी ऐसा ना हो कि जब तुम बड़े हो जाओ तो उनको अलग भेज दो।

याद रखिए कि बहुत बार ऐसा होता है कि इन्सान जब तक उसके माता पिता जीवित होते हैं उनकी बहुत सेवा करता है लेकिन जब यही माता पिता मर जाते हैं तो उनके जीवन में सेवा करने वाले बच्चे उनकी मौत के बाद आक़ हो जाते हैं यानि उसके माता पिता ऊपर (बरज़ख़) उसके लिए बददुआ करते हैं।

इसीलिए इस रिवायत में आया है कि जो अपने माता पिता का धन्यवाद ना करे वह ईश्वर का धन्यवाद करने वाला नही हो सकता।

3. और ईश्वर ने आदेश दिया है कि तक़वा (परहेज़गाही) रखों और अपने परिवार वालों से रिश्ता रखो। उनसे सम्पर्क में रहो

8. قال: لا يَكُونُ الْمُؤْمِنُ مُؤْمِنًا حَتّى تَكُونَ فيهِ ثَلاثُ خِصال:1ـ سُنَّةٌ مِنْ رَبِّهِ. 2ـ وَ سُنَّةٌ مِنْ نَبِيِّهِ. 3ـ وَ سُنَّةٌ مِنْ وَلِيِّهِ. فَأَمَّا السُّنَّةُ مِنْ رَبِّهِ فَكِتْمانُ سِرِّهِ. وَ أَمَّا السُّنَّةُ مِنْ نَبِيِّهِ فَمُداراةُ النّاسِ. وَ أَمَّا السُّنَّةُ مِنْ وَلِيِّهِ فَالصَّبْرُ فِى الْبَأْساءِ وَ الضَّرّاءِ.

इमाम रज़ा (अ) फ़रमाते हैं कि कोई मोमिन मोमिन नही हो सकता मगर यह कि यह तीन गुण उसमें पाए जाते हों

1. एक गुण ख़ुदा की तरफ़ से।

2. एक गुण उसके रसूल की तरफ़ से।

3. एक गुण इमाम की तरफ़ से।

ईश्वर की तरफ़ से गुण यह है कि दूसरे के राज़ों को फ़ाश ना करो। ख़ुदा ऍबों को छिपाने वाला है।

ख़ुदा हमारे बारे में सब कुछ जानता है चाहे वह सामने का हो या छिपा हुआ, वह हमारी नियतों की भी जानकारी रखता है, अगर वह सबके राज़ों को फ़ाश करने लगे तो कोई किसी दूसरे को मुंह दिखाने के क़ाबिल नही रहेगा। लेकिन वह किसी को नही बताता है तो अब जो भी ईश्वर का सच्चा बंदा है उसको ईश्वर की तरह होना चाहिए।

रसूल की तरफ़ से गुण यह है कि लोगों के साथ सहनशीलता दिखाए।

यानी यह ना हो कि अगर किसी ने कोई ग़ल्ती कर दी हो तो तुरन्त उसको सज़ा दी जाए या सबको बताया जाए बल्कि सहनशीलता दिखाओ इसी प्रकार अपने परिवार में भी पत्नी के साथ बच्चों के साथ माता पिता के साथ सहनशील रहो।

इमाम की तरफ़ से गुण यह है कि मुसीबत, समस्याओं और परेशानियों में धैर्य रखे।

इमाम अली (अ) ने क्या किया? उनका हक़ छीन लिया, उनके हाथों को बांधा लेकिन आप चुप रहे और किसी भी समय धैर्य को हाथ से नही जाने दिया।

9. اَلصَّغَائِرُ مَنَ الذُّنُوبِ طُرُقٌ اِلَی الْکَبَائِرِ مَنْ لَمْ یَخَفِ اللهَ فی الْقَلِیلِ لَمْ یَخَفْهُ فِی الْکَثِیرِ و لو لم یخوف اللہ الناس بجنۃ و نار لکان الواجب علیھم ان یطیعوہ و لا یعصوہ، لتفضلہ علیھم، و احسانہ الیھم، و ما بداھم بہ من انعامہ الذی ما استحقوہ

इमाम रज़ा (अ) फ़रमाते हैं कि छोटे गुनाहों से बचो, छोटे पाप बड़े गुनाहों तक पहुँचने का रास्ता हैं (एक बड़े से बांध में अगर छोटा सा भी छेद हो जाए तो पूरा बांध तबाह हो जाता है) और जो छोटे गुनाहों में ख़ुदा से नही डरता है वह बड़े गुनाहों में भी ख़ुदा से नही डरता है।

फिर आप फ़रमाते हैं कि अगर ईश्वर ने हमे डराया ना होता स्वर्ग और नर्क से (कि अगर पाप करोगे तो नर्क में डाले जाओगे) तब भी ईश्वर का अधिकार यह था कि उसके आदेशों की अवहेलना ना की जाए, पाप ना किया जाए, क्यों? क्योंकि उसने यह नेमतें हमें दी हैं, और उसने एहसान किया है।

अगर किसी को इस संसार की हर चीज़ दे दी जाती लेकिन उसको आँखें ना दी जाती, या वह अपाहिज होता या इसी प्रकार की कोई समस्या होती तो क्या करता। यह ख़ुदा है जिसने हमको यह नेमतें दी हैं।

आज शायद हमारा कोई भाई यह कहे कि हम ख़ुदा का शुक्र क्यों करे उसने हमको इतनी समस्याओं में घेर रखा है हमारा बच्चा बीमार है, मेरी नौकरी नही लग रही है, बेटी की शादी नही हो रही है... आदि

तो याद रखिए कि इस संसार में जो सबसे अधिक समस्याओं में घिरा हुआ है उसको भी ख़ुदा का शुक्र करना चाहिए।क्यों? क्योंकि उसने जो हमको नही दिया है हमको उसे मांगने का हक़ नही था और जो हमको दे दिया है हम उसके क़र्ज़दार हैं। हमको यह कहने का अधिकार नही है कि हे ईश्वर क्यों उसको इतना दिया और हमको इतना। यह सदैव ध्यान रखना चाहिए कि ख़ुदा ने जिसको जितना दिया है उससे उतना ही चाहा है उसका दायित्व भी उतना ही बड़ा है, एक अंधे इन्सान का दायित्व आँख वाले से भिन्न है इसी प्रकार हर इन्सान है।

इन्जील में है कि हज़रत ईसा (अ) ने कहा कि अगर शरीर का एक भाग आँख या दूसरा अंग गुनाह करे तो उसको काट कर अलग कर दो क्योंकि उस अंग को काट देना अच्छा है इससे कि वह अंग आग पकड़ ले और तुमको नर्क में पहुँचा दे।

बिलकुल सेब में पाए जाने वाले ख़राब भाग की तरह कि अगर उसको काट कर अलग नही किया गया तो वह पूरे सेब को ख़राब कर देगा।

याद रखिए कोई भी पाप छोटा या बड़ा नही होता है। हर पाप बड़ा है जिन पापों के बारे में हम यह सोचतें हैं कि छोटे हैं उनसे अधिक बचना चाहिए क्योंकि सम्भव है कि उसी पाप में ईश्वर का क्रोध छिपा हो।

۱۰۔ قال لا یتم عقل امرء مسلم حتی تکون فیہ عشر خصال: الخیر منہ مامول، و الشر منہ مامون، یستکثر قلیل الخیر من غیرہ، و یستقل کثیر الخیر من نفسہ، لا یسام من طلب الحوائج الیہ و لا یمل من طلب العلم طول دھرہ، الفقر فی اللہ احب الیہ من الغنی، و الذل فی اللہ احب الیہ من العز فی عدوہ، و الخمول اشھی الیہ من الشھرۃ، ثم قال: العاشر و ما العاشرۃ، قیل لہ: ماھی، قال: لا یری احدا الا قال: ھو خیر منی و اتقی۔

इमाम रज़ा (अ) फ़रमाते है कि किसी भी इन्सान की अक़्ल पूर्ण नही हो सकती मगर यह कि उसमे दस गुण पाए जाते हों

1. अगर कोई इन्सान समस्याओं में घिरा हो तो उसको उससे भलाई की आशा हो।

2. उसकी बुराई से लोग सुरक्षित हों।

3. दूसरे की कम भलाई को भी अधिक समझे।

4. अपनी अधिक भलाई को भी कम समझे।

5. अगर कोई उससे आवश्यकता रखता हो तो वह दुखी ना हो।

6. अपनी पूरी आयु में शिक्षा ग्रहण करने से थकता ना हो।

7. ईश्वर के रास्ते में ग़रीबी उसके लिए अच्छी हो (शैतान के रास्ते में) अमीरी से।

8. ईश्वर के रास्ते में अपमान उसके लिए अधिक प्रिय हो उसके शत्रु के रास्ते में सम्मान से।

9. गुमनामी उसके लिए अच्छी हो प्रसिद्धी से।

फिर आपने कहा दसवा, और तुम क्या जानों दसवां क्या है।

आपसे पूछा गया वह दसवां गुण क्या है?

आपने फ़रमाया

10. किसी को ना देखे मगर यह कहे कि वह मुझसे अच्छा है और मुझसे अधिक परहेज़गार है।

यह हदीस यहीं पर समाप्त हो जाती है लेकिन एक दूसरी हदीस में आया है कि आपने फ़रमाया कि अगर वह किसी ऐसे व्यक्ति को देखे जिसका ज़ाहिर अच्छा हो तो कहे देखों वह मुझसे उच्च हैं, और अगर किसी ऐसे व्यक्ति को देखे जिसका ज़ाहिर अच्छा ना हो तो कहे कि ख़ुदा मैं अपने बारे में जानता हूँ कि मैने कितने पाप किये हैं लेकिन यह ऐसा व्यक्ति है जिसकी आत्मा पवित्र है।

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