ईरान, क्षेत्र में शक्ति और डेमोक्रेसी की अनूठी मिसाल

ईरान में चुनाव
गैर लोकतांत्रिक होने के दावों के निराधार और झूठा होना पूरी दुनिया के समझदार लोगों के लिए तब और अधिक उजागर हो जाता है जब वे देखते हैं कि ईरानी जनता कितने जोर-शोर और भावना के साथ चुनाव में भाग लेकर न केवल अपना भाग्य और भविष्य खुद लिखा है बल्कि क्षेत्रीय और

 

ईरान में चार साल पहले होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के बाद कई परिवर्तन आए हैं, विशेष रूप से पिछले साल में, क्योंकि इस साल ईरान की शक्ति में वृद्धि हुई है।

सीरिया में प्रतिरोधी शक्तियों ने ईरान के नेतृत्व में रूस की मदद से आतंकवादियों अभूतपूर्व नुकसान पहुँचाया, और पूर्वी हैलाब को मुक्त कराया गया था, उसके बाद सीरिया की सरकार को गिराने के लिए परियोजना असफल हो गई और अब पश्चिम के पास दमिश्क सरकार को गिराने का कोई रास्ता नहीं बचा।

सीरिया का प्रतिरोध ऐसी हालत में सफल हुआ है कि जब पश्चिमी देशों अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर सीरिया की सरकार को गिराने चाहते थे ताकि ईरान के एक महत्वपूर्ण घटक को इससे दूर कर सकें।

लेकिन प्रतिरोध ने उसी को अपने लिए एक अवसर बनाकर अपनी जीत में बदल दिया, और शायद ही कोई ऐसा हो जो क्षेत्र में ईरान की बढ़ती शक्ति को स्वीकार न करे।
इराक में भी ईरान समर्थित समूहों ने आइएस से मुक़ाबता करते हुए उन्हें अपने शहरों से खदेड़ दिया है और आतंकवाद के विरुद्ध यह लड़ाई अपने अंतिम चरण मूसिल की स्वतंत्रता में है।

ईरान की इराक और सीरिया में जीत से तेहरान दुश्मन परेशान हो गए हैं, और उन्होंने ईरान के के पश्चिम में प्रशांत महासागर तक ईरान की पहुँच पर चिंता भी व्यक्त भी की है और हर संभव कोशिश कर रहे हैं कि इस काम को रोक सकें।

अगरचे ईरान में ऐसे लोगो की संख्या बहुत कम है पश्चिमी मीडिया की बनाई हुई हवा में बहते हुए ईरान को सीरिया और इराक की तबाही का कारण मानते हैं, लेकिन विश्वसनीय और प्रामाणिक दस्तावेजों से पता चलता है कि पश्चिमी देश आतंकवादियों और सल्फ़ी समूहों की मदद से कैसे अपने लक्ष्य को पाना चाहते हैं।

ज्ञात रहे कि इस क्षेत्र में पश्चिमी देशों द्वारा वहाबी समूहों को सहायता की यह कोई पहली घटना नहीं है, इससे पहले भी वह यह काम कर चुके हैं, जैसा अफगानिस्तान में उन्होंने ऐसा किया था।

दूसरी ओर सारी दुनिया अब यह बात जान चुकी है कि अमरीका के सीरिया में लोकतांत्रिक व्यवस्था के दावे निराधार थे क्योंकि वह सऊदी और कतर जैसे देशों के पैसे का उपयोग कर रहा है जिनमें खुद लोकतंत्र नहीं है।

और इससे बढ़कर महत्वपूर्ण बात यह कि पश्चिमी दुनिया के ईरान के खिलाफ दावे जो कहते हैं कि ईरान में लोकतंत्र नहीं है और ईरानी प्रणाली एक गैर लोकतांत्रिक प्रणाली है, इन दावों के निराधार और झूठा होना पूरी दुनिया के समझदार लोगों के लिए तब और अधिक उजागर हो जाता है जब वे देखते हैं कि ईरानी जनता कितने जोर-शोर और भावना के साथ चुनाव में भाग लेकर न केवल अपना भाग्य और भविष्य खुद लिखा है बल्कि क्षेत्रीय और पश्चिमी देशों को भी लोकतंत्र का सबक सिखाया है यहां तक कि ईरान के घोर शत्रु भी इस बात को स्वीकार करने और शाबाश कहने पर मजबूर हो जाते हैं।

अमेरिका के जॉन हॉपकिन्स विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंध की विद्वान और «मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट » की «रैंडी स्लेम» ईरानी चैनलों में प्रसारित होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के उम्मीदवारों की डिबेट के बारे में लिखती हैं: क्षेत्र में ईरानी नीतियों की जोरदार विरोधी होते हुए भी यह इच्छा रखती हूँ कि काश किसी दिन अरबी देशों में भी ऐसे दृश्य देखने को मिलें।

اشتراک گذاری: 

नई टिप्पणी जोड़ें

Fill in the blank.