ख़ुत्बा –ए- शाबानिया और रमज़ान का महत्व

salwat e shabaniya
हे लोगों! जान लो कि अल्लाह का महीना, बरकतों, रहमतों और गुनाहों की बख़्शिशों के साथ तुम्हारी तरफ़ आया है, वह महीना जो अल्लाह के नज़दीक तमाम महीनों से अधिक महत्वपूर्ण है, और जिसके दिन दूसरे दिनों से श्रेष्ठ, उसकी रातें दूसरी रातों से अधिक महान और जिसके घड़ि

ख़ुत्बा –ए- शाबानिया और रमज़ान का महत्व

सैय्यद ताजदार हुसैन ज़ैदी

« بسم الله الرحمن الرحیم »

إنَّ رَسولَ اللّه ِ صلى الله علیه و آله خَطَبَنا ذاتَ یَومٍ فَقالَ : أیُّهَا النّاسُ ، إنَّهُ قَد أقبَلَ إلَیکُم شَهرُ اللّه ِ بِالبَرَکَةِ وَالرَّحمَةِ وَالمَغفِرَةِ ،

شَهرٌ هُوَ عِندَ اللّه ِ أفضَلُ الشُّهورِ ، وَأیّامُهُ أفضَلُ الأَیّامِ ، ولَیالیهِ أفضَلُ اللَّیالی ، وساعاتُهُ أفضَلُ السّاعاتِ . هُوَ شَهرٌ دُعیتُم فیهِ إلى ضِیافَةِ اللّه ِ ،

وجُعِلتُم فیهِ مِن أهلِ کَرامَةِ اللّه ِ ، أنفاسُکُم فیهِ تَسبیحٌ ، ونَومُکُم فیهِ عِبادَةٌ ، وعَمَلُکُم فیهِ مَقبولٌ ، ودُعاؤُکُم فیهِ مُستَجابٌ .

فَاسأَلُوا اللّه َ رَبَّکُم بِنِیّاتٍ صادِقَةٍ وقُلوبٍ طاهِرَةٍ أن یُوَفِّقَکُم لِصِیامِهِ وتِلاوَةِ کِتابِهِ ؛ فَإِنَّ الشَّقِیَّ مَن حُرِمَ غُفرانَ اللّه ِ فی هذَا الشَّهرِ العَظیمِ .

وَاذکُروا بِجوعِکُم وعَطَشِکُم فیهِ جوعَ یَومِ القِیامَةِ وعَطَشَهُ ، وتَصَدَّقوا عَلى فُقَرائِکُم ومَساکینِکُم ، ووَقِّروا کِبارَکُم ، وَارحَموا صِغارَکُم ، وصِلوا أرحامَکُم ،

وَاحفَظوا ألسِنَتَکُم ، وغُضّوا عَمّا لا یَحِلُّ النَّظَرُ إلَیهِ أبصارَکُم ، وعَمّا لا یَحِلُّ الاِستِماعُ إلَیهِ أسماعَکُم ، وتَحَنَّنوا عَلى أیتامِ النّاسِ یُتَحَنَّن عَلى أیتامِکُم ،

وتوبوا إلَى اللّه ِ مِن ذُنوبِکُم ، وَارفَعوا إلَیهِ أیدِیَکُم بِالدُّعاءِ فی أوقاتِ صَلَواتِکُم ؛ فَإِنَّها أفضَلُ السّاعاتِ ، یَنظُرُ اللّه ُ عز و جل فیها بِالرَّحمَةِ إلى عِبادِهِ ،یُجیبُهُم إذا ناجَوهُ ، ویُلَبّیهِم إذا نادَوهُ ویَستَجیبُ لَهُم إذا دَعَوهُ .

یا أیُّهَا النّاسُ ، إنَّ أنفُسَکُم مَرهونَةٌ بِأَعمالِکُم فَفُکّوها بِاستِغفارِکُم ، وظُهورَکُم ثَقیلَةٌ مِن أوزارِکُم فَخَفِّفوا عَنها بِطولِ سُجودِکُم ،

وَاعلَموا أنَّ اللّه َ ـ تَعالى ذِکرُهُ ـ أقسَمَ بِعِزَّتِهِ ألاّ یُعَذِّبَ المُصَلّینَ وَالسّاجِدینَ ، ولا یُرَوِّعَهُم بِالنّارِ یَومَ یَقومُ النّاسُ لِرَبِّ العالَمینَ .

أیُّهَا النّاسُ ، مَن فَطَّرَ مِنکُم صائِما مُؤمِنا فی هذَا الشَّهرِ کانَ لَهُ بِذلِکَ عِندَ اللّه ِ عِتقُ نَسَمَةٍ ومَغفِرَةٌ لِما مَضى مِن ذُنوبِهِ

فَقیلَ : یا رَسولَ اللّه ِ ، ولَیسَ کُلُّنا یَقدِرُ عَلى ذلِکَ! فَقالَ صلى الله علیه و آله : اِتَّقُوا النّارَ ولَو بِشِقِّ تَمرَةٍ ، اِتَّقُوا النّارَ ولَو بِشَربَةٍ مِن ماءٍ .

أیُّهَا النّاسُ ، مَن حَسَّنَ مِنکُم فی هذَا الشَّهرِ خُلُقَهُ کانَ لَهُ جَوازا عَلَى الصِّراطِ یَومَ تَزِلُّ فیهِ الأَقدامُ ،

ومَن خَفَّفَ فی هذَا الشَّهرِ عَمّا مَلَکَت یَمینُهُ خَفَّفَ اللّه ُ عَنهُ حِسابَهُ ، ومَن کَفَّ فیهِ شَرَّهُ کَفَّ اللّه ُ فیهِ غَضَبَهُ یَومَ یَلقاهُ ،

ومَن أکرَمَ فیهِ یَتیما أکرَمَهُ اللّه ُ یَومَ یَلقاهُ ، ومَن وَصَلَ فیهِ رَحِمَهُ وَصَلَهُ اللّه ُ بِرَحمَتِهِ یَومَ یَلقاهُ ، ومَن قَطَعَ رَحِمَهُ قَطَعَ اللّه ُ عَنهُ رَحمَتَهُ یَومَ یَلقاهُ ،

ومَن تَطَوَّعَ فیهِ بِصَلاةٍ کُتِبَ لَهُ بَراءَةٌ مِنَ النّارِ ، ومَن أدّى فیهِ فَرضا کانَ لَهُ ثَوابُ مَن أدّى سَبعینَ فَریضَةً فیما سِواهُ مِنَ الشُّهورِ

ومَن أکثَرَ فیهِ مِنَ الصَّلاةِ عَلَیَّ ثَقَّلَ اللّه ُ میزانَهُ یَومَ تَخَفَّفُ المَوازینُ ، ومَن تَلا فیهِ آیَةً مِنَ القُرآنِ کانَ لَهُ مِثلُ أجرِ مَن خَتَمَ القُرآنَ فی غَیرِهِ مِنَ الشُّهورِ .

أیُّهَا النّاسُ ، إنَّ أبوابَ الجِنانِ فی هذَا الشَّهرِ مُفَتَّحَةٌ ، فَاسأَلوا رَبَّکُم ألاّ یُغلِقَها عَلَیکُم ، وأبوابَ النّیرانِ مُغَلَّقَةٌ فَاسأَلوا رَبَّکُم ألاّ یَفتَحَها عَلَیکُم ،وَالشَّیاطینَ مَغلولَةٌ فَاسأَلوا رَبَّکُم ألاّ یُسَلِّطَها عَلَیکُم

قالَ أمیرُ المُؤمِنینَ علیه السلام : فَقُمتُ فَقُلتُ : یا رَسولَ اللّه ِ ، ما أفضَلُ الأَعمالِ فی هذا الشَّهرِ؟

فَقالَ : یا أبَا الحَسَنِ ، أفضَلُ الأَعمالِ فی هذَا الشَّهرِ الوَرَعُ عَن مَحارِمِ اللّه ِ عز و جل  . ثُمَّ بَکى ،

فَقُلتُ : یا رَسولَ اللّه ِ ، ما یُبکیکَ؟ فَقالَ : یا عَلِیُّ ، أبکی لِما یُستَحَلُّ مِنکَ فی هذَا الشَّهرِ ، کَأَنّی بِکَ وأنتَ تُصَلّی لِرَبِّکَ ، وقَدِ انبَعَثَ أشقَى الأَوَّلینَ وَالآخِرینَ ،شَقیقُ عاقِرِ ناقَةِ ثَمودَ ، فَضَرَبَکَ ضَربَةً عَلى فَرقِکَ (قَرنِکَ) فَخَضَّبَ مِنها لِحیَتَکَ

قالَ أمیرُ المُؤمِنینَ علیه السلام : فَقُلتُ : یا رَسولَ اللّه ِ وذلِکَ فی سَلامَةٍ مِن دینی؟

فَقالَ : فی سَلامَةٍ مِن دینِکَ» . ثُمَّ قالَ صلى الله علیه و آله : «یا عَلِیُّ ، مَن قَتَلَکَ فَقَد قَتَلَنی ، ومَن أبغَضَکَ فَقَد أبغَضَنی ، ومَن سَبَّکَ فَقَد سَبَّنی ؛ لِأَنَّکَ مِنّی کَنَفسی ، وَروحُکَ مِن روحی ، وَطینَتُکَ مِن طینَتی . إنَّ اللّه َ ـ تَبارَکَ وَتَعالى ـ خَلَقَنی وإیّاکَ ، وَاصطَفانی وَإیّاکَ ، وَاختارَنی لِلنُّبُوَّةِ وَاختارَکَ لِلإِمامَةِ ،

وَمَن أنکَرَ إمامَتَکَ فَقَد أنکَرَنی نُبُوَّتی . یا عَلِیُّ ، أنتَ وَصِیِّی ، وأبو وُلدی ، وزَوجُ ابنَتی ، وخَلیفَتی عَلى اُمَّتی فی حَیاتی وبَعدَ مَوتی ، أمرُکَ أمری ونَهیُکَ نَهیی .

اُقسِمُ بِالَّذی بَعَثَنی بِالنُّبُوَّةِ وجَعَلَنی خَیرَ البَرِیَّةِ ، إنَّکَ لَحُجَّةُ اللّه ِ عَلى خَلقِهِ ، وأمینُهُ عَلى سِرِّهِ ، وَخَلیفَتُهُ عَلى عِبادِهِ

इमाम रज़ा (अ) ने अपने दादा उन्होंने इमाम अली (अ) से रिवायत की है कि एक दिन पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने ख़ुत्बा दिया जिसमें आपने फ़रमायाः

हे लोगों! जान लो कि अल्लाह का महीना, बरकतों, रहमतों और गुनाहों की बख़्शिशों के साथ तुम्हारी तरफ़ आया है, वह महीना जो अल्लाह के नज़दीक तमाम महीनों से अधिक महत्वपूर्ण है, और जिसके दिन दूसरे दिनों से श्रेष्ठ, उसकी रातें दूसरी रातों से अधिक महान और जिसके घड़ियां दूसरी घड़ियों से अधिक फ़ज़ीलत वाली है।

वह महीना है जिसमें तुम को अल्लाह की मेहमानी का निमंत्रण दिया गया है और जिसमें तुमको अल्लाह की तरफ़ से सम्मानित लोगों में रखा गया है।

इस महीने में तुम्हारी सांसें तस्बीह, नींद इबादत, तुम्हारे कार्य स्वीकार्य और दुआएं क़ुबूल हैं। तो पवित्र नियतों और सच्चे दिलों के साथ अपने ईश्वर से प्रार्थना करो कि रोज़ा रखने और अपनी किताब (क़ुरआन) की तिलावत की तौफ़ीक़ दे।

क्योंकि अभागा वह है कि जो महान महीने में अल्लाह की क्षमा से वंचित रह जाए। इस महीने में अपनी भूख और प्यास से क़यामत की भूख और प्यास को याद करो, अपने मजबूरों और ग़रीबों को सदक़ा (ख़ैरात) दो,

अपने बड़ों का सम्मान करो, और छोटों पर दया, अपने रिश्तेदारों के साथ नेकी करो, अपनी ज़बानों पर लगाम लगाओ, अपनी आँखों को हर उस चीज़ पर बंद कर दो जिसको देखना जायज़ नहीं है,

अपने कानों को हर उस चीज़ के लिये बंद कर दो जिसका सुनना हलाल नहीं है, दूसरों के यतीमों से मुहब्बत करो ताकि वह तुम्हारे यतीमों से मुहब्बत करें, अपने पापों पर अल्लाह से क्षमा मांगो, और नमाज़ के समय उसकी बारगाह में दुआ के लिये हाथ उठाओ, क्योंकि वह (नमाज़ का समय) बेहतरीन समय है और अल्लाह अपने बंदों को कृपा की दृष्टि से देखता है और जब वह उससे प्रार्थना करते हैं तो वह उनकी सुनता है और जब उसको पुकारते हैं तो उनका उत्तर देता है और जब वह उसको बुलाते हैं तो वह जवाब देता है।

हे लोगों! तुम्हारी आत्माएं तुम्हारे कर्मों की गिरवी हैं तो क्षमा याचना से उनको आज़ाद करो, और तुम्हारी पीठ तुम्हारे पापों के बोझ तले दबी है, तो सजदों को लंबा करके उसको हलका करो, और जान लो कि महान ईश्वर ने अपनी इज़्ज़त की क़सम खाई है कि वह नमाज़ियों और सजदा करने वालों पर अज़ाब नहीं करेगा, और जिस दिन लोग संसार के पालने वाले के सामने (हिसाब किताब के लिये) खड़े होंगे, उनको (नर्क की) आज से नहीं डराएगा।

दास को आज़ाद करने और उसके पिछले पापों की क्षमा है

तो लोगों ने कहाः हे अल्लाह के रसूल हम सभी इस कार्य (दूसरों को अफ़तार कराना) को नहीं कर सकते हैं!

पैग़म्बर ने फ़रमायाः अपने आप को आग से बचाओ चाहे एक खजूर से ही, ख़ुद के आग से बचाओ चाहे एक घूँट पानी से ही क्यों न हो।

हे लोगों! जो भी इस महीने में अपना आचरण अच्छा करे वह उसके लिये पुले सिरात के गुज़रने का माध्यम होगा, उस दिन कि जब पुले सिरात पर क़दम डगमगाएंगे।

और जो भी इस महीने में अपने ग़ुलामों (अपने नीचे काम करने वालों) से आसानी से पेश आए अल्लाह हिसाब (क़यामत) के दिन उसके हिसाब आसान लेगा, और जो भी इस महीने में अपने बुराई को दूसरों से दूर रखे, अल्लाह उससे मुलाक़ात (क़यामत) के दिन अपने क्रोध को उससे दूर रखेगा, और जो भी इस महीने में किसी यतीम का सम्मान करे, क़यामत के दिन अल्लाह उसका सम्मान करेगा।

और जो भी इस महीने में अपने रिश्तेदारों के साथ नेकी करे क़यामत के दिन अल्लाह अपनी रहमत से उसके साथ नेकी करेगा, और जो भी इस महीने में अपने रिश्तेदारों के साथ संबंध तोड़ ले अल्लाह क़यामत के दिन उससे अपनी रहमत को दूर कर देगा,

और जो भी इस महीने में एक मुस्तहेब नमाज़ पढ़े, उसके लिये नर्क की आग से दूरी का परवाना लिखा जाएगा, और जो भी इस महीने में किसी वाजिब को अदा करे उसका सवाब वैसा ही है जैसे किसी ने दूसरे महीनों में सत्तर वाजिब को अदा किया हो

और जो भी इस महीने में मुझ पर अधिक से अधिक सलवात पढ़े, अल्लाह उस दिन कि जब आमाल का पलड़ा हलका होगा उसके आमाल के पलड़े को भारी कर देगा।

और जो इस महीने में क़ुरआन की एक आयत की तिलावत करे उसका सवाब दूसरे महीनों में पूरे क़ुरआन को पढ़ने का सवाब है।

हे लोगों! इस महीने में स्वर्ग के द्वार खुले हैं तो अपने परवरदिगार से दुआ करो कि वह तुम पर बंद न हो, और नर्क के द्वार बंद हैं तो अपने अल्लाह से दुआ करो कि वह तुम पर नर्क के द्वार न खोल दे, और शैतान क़ैद में है तो अपने परवरदिगार से प्रार्थना करो कि वह उसको तुम पर हावी न कर दे।

मैं (अली अलैहिस्सलाम) उठा और कहाः हे अल्लाह के रसूल इस महीने में सबसे अच्छा कार्य क्या है?

फ़रमायाः हे अबुल हसन! इस महीने में बेहतरीन कार्य हराम से बचना है। फिर आपने गिरया किया।

मैंने पूछाः हे अल्लाह के रसूल! आपके रोने का कारण क्या है?

फ़रमायाः हे अली! मैं इसलिये रो रहा हूँ कि इस महीने में तुम्हारे सम्मान को ठेस पहुँचाएंगे। और मैं देख रहा हूँ कि तुम अपने अल्लाह के लिये नमाज़ की हालत में हो और अव्वलीन एवं आख़ेरीन का सबसे अभागा व्यक्ति जो कि हज़रत सालेह के ऊँट के पैर काटने वाले का भाई है तुम्हारे सर पर तलवार का वार करता है और तुम्हारी दाढ़ी तुम्हारे सर के ख़ून से रंगीन हो जाती है।

मैंने कहाः हे अल्लाह के रसूल क्या उस हालत में मेरा दीन सही होगा? (मैं दीन के बताए रास्ते पर होऊँगा।)

फ़रमायाः तुम्हारा दीन सही है।

फिर फरमायाः हे अली, जो तुम को क़त्ल करे उसने मुझे क़त्ल किया है, और जो तुमसे दुश्मनी करे उसने मुझसे दुश्मनी की है और जो तुमको बुरा कहे उसने मुझे बुरा कहा है, क्योंकि तुम मुझ से हो मेरी जान की तरह, तुम्हारी आत्मा मेरी आत्मा से है और तुम्हारी प्रकृति मेरी प्रकृति है।

महान ईश्वर ने मुझे और तुम्हें पैदा किया और मुझे व तुम्हें चुना और उसने मुझे पैग़म्बरी के लिये और तुम्हें इमामत के लिये चुना।

जो तुम्हारी इमामत का इनकार करे उसने मेरी नबूवत का इनकार किया है।

हे अली! तुम मेरी वसी, मेरी बेटों के पिता मेरी बेटी के जीवनसाथी और क़ौम पर मेरे जानशीन हो मेरे जीवन और मेरी मृत्यु के बाद तुम्हारा आदेश मेरा आदेश है और तुम्हारा किसी कार्य से रोकना  मेरा रोकना है, सौगंध है उस अल्लाह की जिसने मुझे नबूवत का मक़ाम दिया और मुझे बेहतरीन मख़लूक़ बनाया

तुम अल्लाह की सृष्टि पर उसकी हुज्जत हो और उसको रहस्यों के अमीन और उसके बंदों पर उसके जानशीन हो।

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