इमाम हसन (अ) की हदीसें

इमाम हसन (अ) की हदीसें
निःसंदेह सबसे अधिक देखने वाली आखें वह है जो नेक रास्ते को देख लें, और सबसे अधिक सुनने वाले कान वह हैं जो नसीहत सुने और उसने फ़ायदा उठाएं, सबसे स्वस्थ दिल वह हैं जो संदेह से पवित्र हो।

बेहतरीन इन्सान

قال الامام حسن المجتبی علیه السلام: إِنَّ أَبْصَرَ الأَبـْصارِ ما نَفَذَ فِى الخَیرِ مَذْهَبُهُ، وَ أَسْمَعُ الاْسـْماعِ ما وَعَى التَّذْكیرَ وَ انْتَفَعَ بِهِ، أَسْلَمُ الْقُلُوبِ ما طَهُرَ مِنَ الشُّبُهاتِ

निःसंदेह सबसे अधिक देखने वाली आखें वह है जो नेक रास्ते को देख लें, और सबसे अधिक सुनने वाले कान वह हैं जो नसीहत सुने और उसने फ़ायदा उठाएं, सबसे स्वस्थ दिल वह हैं जो संदेह से पवित्र हो।

(तोहफ़ुल उक़ूल पेज 235)

किस से दोस्ती करें

قالَ الْحَسَن(علیه السلام) لِبَعْضِ وُلْدِهِ: یا بُنَىَّ لا تُواخِ أَحَدًا حَتّى تَعْرِفَ مَوارِدَهُ وَ مَصادِرَهُ فَإِذَا اسْتَنْبطْتَ الْخُبْرَةَ وَ رَضیتَ الْعِشْرَةَ فَآخِهِ عَلى إِقالَةِ الْعَثْرَةِ وَ الْمُواساةِ فِى الْعُسْرَةِ

इमाम हसन (अ) ने अपने एक बेटे से फ़रमायाः मेरे बेटे! किसी के साथ दोस्ती न करो मगर यह कि जान लो कि वह कहा जाता है और कहां से आता है, और जब उसके बारे में अच्छे से जान लिया और उसका रहन सहन पसंद आया तो उससे दोस्ती करो, ग़ल्तियों को अनदेखा करने और परेशानियों में साथ देने की शर्त के साथ।

(तोहफ़ुल उक़ूल पेज 233)

मस्जिद जाने के फ़ायदे

قال الامام حسن المجتبی علیه السلام

مَنْ أَدامَ الاِخْتِلافَ إِلَى الْمَسْجِدِ أَصابَ إِحْدى ثَمان

آیةً مُحْكَمَةً وَ أَخًا مُسْتَفادًا وَ عِلْمًا مُسْتَطْرَفًا وَ رَحْمَةً مُنْتَظِرَةً وَ كَلِمَةً تَدُلُّهُ عَلَى الهُدى أَوْ تَرُدُّهُ عَنْ رَدًى وَ تَرْكَ الذُّنُوبِ حَیاءً أَوْ خَشْیةً

इमाम हसन (अ)  ने फ़रमायाः

जो भी लगातार मस्जिद जाता है वह इन आठ फ़ायदों में से एक को अवश्य पाता हैः

1.    मोहकम आयते (ईश्वरीय आयतों को समझता है)

2.    फ़ायदेमंद दोस्त,

3.    नया ज्ञान,

4.    प्रतीक्षित कृपा और रहमत,

5.    ऐसी बात जो उसको सीधे रास्ते पर ला दे,

6.    या ऐसी बात जो उसको पस्ती से बचा ले,

7.    और पापों का छोड़ना ईश्वर से शर्म करते हुए,

8.    या पाप का छोड़ना ईश्वर से डर के कारण

(तोहफ़ुल उक़ूल, पेज 238)

दस्तरख़ान का अदब

قال الامام الحسن بن علیّ علیهما السلام

فِی المائِدَةُ اِثنَتَا عَشرَةَ خَصلَةً یَجِبُ عَلی کُلِّ مَسلِمٍ اَن یَعرِفَها، اَربَعٌ مُنها فَرضٌ، وَ ارَبَعٌ مِنها سُنَّةٌ، وَ اَربَعٌ مِنها تَأدیبٌ، فَاَمّا الفَرضُ: فَالمَعرِفَةُ، وَ الرِّضا، اوَ التَّسمِیةُ، وَ الشُکرُ، وَ اَمَّا السُنَّةُ: فَالوُضُوءُ قَبلَ الطَّعامِ، وَ الجُلوُسُ عَلی الجانِبِ الاَیسَرِ، وَ الاَ کلُ بِثلاثُ اَصابِعَ، وَ لَعقُ الاَصابِعِ وَ اَمَّا التَّأدیبُ فَالاَکلُ مِمّا یَلیکَ، وَ تَصغیرُ اللُّقمَةِ، وَ المَضغُ الشَّدیدِ وَ قِلَّةُ النَّظَرُ فی وُجُوهِ النّاسُ

इमाम हसन (अ) ने फ़रमायाः

ख़ाना खाने और दस्तरख़ान में 12 विशेषताएं है, हर मुसलमान पर वाजिब हैं कि उनको पहचानें, उसकी चार विशेषताएं वाजिब और चार मुस्तहेब और दूसरी चार अदब हैं।

वाजिबः

(नेमत देने वाले) की पहचान,

और अल्लाह की नेमत पर राज़ी रहना,

और अल्लाह के नाम से आरम्भ करना,

और ईश्वर का शुक्र और प्रशंसा करना,

मुस्तहेबः

खाने से पहले हाथ धोना,

और बाएं पैर की तरफ़ बैठना

और तीन उंगलियों से खाना खाना

और उंगलियों को चाटना।

खाना खाने का अदब (आदर्श)

अपने सामने से खाना खाना

और छोटे निवाले खाना

और निवालों को अच्छे से चबाना

और दूसरो की तरफ़ कम देखना

(रौज़तुव वाएज़ीन जिल्द 2 पेज 311)

गुनाहों से दूरी का बेहतरीन रास्ता

قال الامام الحسن بن علیّ علیهما السلام

اَنَّهُ جاءَهُ رَجُلٌ وَ قالَ اَنَا رَجُلٌ عاصٍ وَ لا صَبرَ لی عَن (عَلَی) المَعصِیَةِ فَعِظنی بِمَوعِظَةٍ

فَقالَ (ع). اِفعَل خَمسَةَ اَشیاءَ وَ اذنِب ماشِئتَ، لاتَأکُل رِزقَ اللهِ وَ اذنِب ما شِئتَ وَ اطلُب مَوضِعاً لایَراکَ اللهُ وَ اذنِب ما شِئتَ، وَ اخرُج مِن وِلایَةِ اللهِ وَ اذنِب ما شِئتَ، وَ اِذاجاءَکَ مَلَکُ الموتِ لِیَقبِضَ روُحَکَ فَادفَعهُ عَن نَفسِکَ وَ اذنِب ما شِئتَ، وَ اِذا اَدخَلَکَ مالِکٌ النّارَ فَلا تَدخُل فِی النّارُ وَاذنِب ماشَئتَ.

एक आदमी इमाम हसन (अ) की ख़िदमत में आया और कहने लगाः मैं पापी हूँ और मुझे पापों से दूर रहने पर कंट्रोल नहीं है (मैं गुनाह छोड़ने की शक्ति नहीं रखता हूँ आप मुझे नसीहत करें ताकि मैं गुनाह छोड़ सकूँ)

तो आपने फ़रमायाः

पाँच कार्य करों उसके बाद जो चाहे गुनाह करोः

1.    ईश्वर की दी हुई रोज़ी को न खाओ उसके बाद जो चाहों पाप करो।

2.    (पाप के समय) एसा स्थान चुनो जहां ईश्वर तुमको न देख सके उसके बाद जो चाहों पाप करो।

3.    ईश्वर की शक्ति और संसार से बाहर चले जाओ उसके बाद जो चाहो पाप करो।

4.    जब यमदूत तुम्हारी आत्मा को ले जाने के लिये आए (न मरने के लिये) उसको अपने से दूर कर दो फिर जो चाहो पाप करो।

5.    जब मालिक (नर्क का दरबान) तुमको नर्क में डाले तो (अगर शक्ति रखते हो तो) नर्क में न जाओ उसके बाद जो चाहो पाप करो

(इसना अशरिया, पेज 112)

 

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