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इमाम हुसैन (अ.) का पहला चेहलुम
वह दिन जब जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह अन्सारी इमाम की ज़ियारत करने पहुँचे चेहलुम यानि इमाम की शहादत का चालीसवाँ दिन था। जाबिर के साथ हज़रत अली (अ.) के एक सहाबी भी थे जो कूफ़े के रहने वाले थे और उनका नाम अतिया इब्ने हारिस था। इन दिनों जाबिर मदीने में रहते थे
इमाम हुसैन का पहला ज़ाएर
अतिया औफ़ी कहते हैः जाबिर बिन अब्दुल्लाहे अंसारी के साथ इमाम हुसैन (अ) की क़ब्र की ज़ियारत के लिये बाहर निकले, जब हम कर्बला पहुँचे जाबिर फ़ुरात के किनारे पहुँचे और वहां ग़ुस्ल किया, उसके बाद एक लुंगी बांधी और एक कपड़ा अपने कांधे पर डाला, और एक थैला निकाला
ख़ूने हुसैन का बदला लेने वाले हज़रत मुख़्तार के बारे में जानें
जब हज़रत मुख़्तार ने ख़ूने हुसैन के इन्तेक़ाम का नारा बुलंद किया तो आपके इस आन्दोलन में आशूर के दिन इमाम हुसैन की हत्या में शरीक रहने वाले अधिकतर मुजरिमें को मौत के घाट उतार दिया गया।
करबला का इतिहास
करबला की जंग 10 मोहर्रम सन 61 हिजरी 10 अक्तूबर 680 ई0 (1) को हुई जिसको हम आशूरा की जंग के नाम से भी जानते हैं, यह जंग पैग़म्बरे इस्लाम के छोटे नवासे इमाम हुसैन और बनी उमय्या के दूसरे बादशाह यज़ीद के बीच करबला में हुई जो इस समय इराक़ का एक पवित्र और...
उन्नीस मोहर्रम, हुसैनी क़ाफ़िले के साथ
उन्नीस मोहर्रम सन 61 हिजरी को कर्बला के क़ैदियों का काफ़िला शाम की तरफ़ भेजा गया, और चूँकि शाम की सत्ता मोआविया के ही युग से बनी उमय्या के हाथों में थी और बनी उमय्या अहलेबैत (अ) से शत्रुता में प्रसिद्ध थे और और दूसरी तरफ़ से मोआविया पैग़म्बरे इस्लाम (स)
बीस मोहर्रम, हुसैनी काफ़िले के साथ
आशूर के दस दिन के बाद बनी असद के कुछ लोगों ने हज़रत अबूज़र ग़फ़्फ़ारी के दास हज़रत जौन के पवित्र शरीर को देखा इस अवस्था में कि उनके चेहरे से प्रकाश फैल रहा था और उनके शरीर से सुगंध आ रही थी, इन लोगों ने हज़रत जौन को दफ़्न किया।