इमाम हुसैन का पहला ज़ाएर

अतिया औफ़ी कहते हैः जाबिर बिन अब्दुल्लाहे अंसारी के साथ इमाम हुसैन (अ) की क़ब्र की ज़ियारत के लिये बाहर निकले, जब हम कर्बला पहुँचे जाबिर फ़ुरात के किनारे पहुँचे और वहां ग़ुस्ल किया, उसके बाद एक लुंगी बांधी और एक कपड़ा अपने कांधे पर डाला, और एक थैला निकाला

सैय्यद ताजदार हुसैन ज़ैदी

कुछ लेखों में आया है कि इमाम हुसैन (अ) के पहले श्रद्धालु जाबिर बिन अब्दुल्लाहे अंसारी थे जो पैगम़्बरे इस्लाम (स) के महान सहाबी थे जो अतिया के साथ इमाम हुसैन (अ) की शहादत के चालीसवें दिन कर्बला आये और आपकी ज़ियारत की।

عَنْ عَطِیَّةَ الْعَوْفِیِّ قَالَ‏ : خَرَجْتُ مَعَ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ الْأَنْصَارِیِّ زَائِرَیْنِ قَبْرَ الْحُسَیْنِ بْنِ عَلِیِّ بْنِ أَبِی طَالِبٍ علیهماالسلام فَلَمَّا وَرَدْنَا کَرْبَلَاء.. (1)

अतिया बिन सअद बिन जनादा अल औफ़ी अपने युग के महान ज्ञानियों में से हैं कि जिनके बारे में कहा गया है कि انه أول من زار الحسین علیه السلام مع جابر الأنصاری‏.» वह पहले व्यक्ति है जिन्होंने जाबिर के साथ इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत की।

अतिया औफ़ी कहते हैः जाबिर बिन अब्दुल्लाहे अंसारी के साथ इमाम हुसैन (अ) की क़ब्र की ज़ियारत के लिये बाहर निकले, जब हम कर्बला पहुँचे जाबिर फ़ुरात के किनारे पहुँचे और वहां ग़ुस्ल किया, उसके बाद एक लुंगी बांधी और एक कपड़ा अपने कांधे पर डाला, और एक थैला निकाला और कुछ मात्रा में काफ़ूर स्वंय पर डाला। उसके बाद ईश्वर का पाठ करते हुए क़ब्र की तरफ़ चल पड़े और जब क़ब्र के पास पहुँचे तो कहाः मेरे हाथ को क़ब्र पर रख दो, मैंने उनके हाथ को क़ब्र पर रख दिया और वह बेहोश हो गये। मैंने उनके चेहरे पर पानी डाला और वह होश में आ गये। उसके बाद कहाः या हुसैन, और तीन बार इस शब्द को दोहराया और उसके बाद कहाः दोस्त क्या दोस्त का जवाब नहीं देता है? फिर कहाः तुम मुझे कैसे उत्तर दोगे जब कि तुम्हारा सर तुम्हारे शरीर से अलग कर दिया गया, और तुम्हारी रगों को उन्होंने काट दिया है, मैं गवाही देता हूँ कि तुम पैग़म्बरों के बेटे हो और मोमिनों के सरदारों की संतान हो। हे हुसैन आप तक़वे और वादा निभाने वाले थे, और मार्गदर्शन की जड़ समझे जाते थे, तुम किसा के पांचवे सदस्य हो, तुम सैय्यदे नुक़बा के बेटे हो तुम फ़ातेमा ज़हरा की औलाद हो...

इसी प्रकार किताबों में है कि अहलेबैते अतहार भी पहले चेहलुम को इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत के लिये कर्बला पहुँचे, अगरचे इस बारे में कि यह लोग पहले चेहलुम को कर्बला पहुँचे हैं या उसके बाद के सालों में मतभेद पाया जाता है, लेकिन महत्वपूर्ण चीज़ यह है कि अरबईन की ज़ियारत की परंपरा को अहलेबैत ने जीवित किया है और इन्ही का अनुसरण करते हुए शिया हर साल आपकी ज़ियारत करने के लिये दुनिया के कोने कोने से कर्बला पहुँचते हैं।
एक दूसरी रिवायत में आया है कि अब्दुल्लाह हर्र जअफ़ी जिसने कर्बला में इमाम हुसैन (अ) की सहायता नहीं की थी, उबैदुल्लाह बिन ज़ियाद से मिलने के बाद कर्बला की तरफ़ चले और वहां इमाम हुसैन (अ) के लिये नौहा पढ़ा।

शहीदों की मज़ारों पर पहला कूफ़ी श्रद्धालु

उबैदुल्लाह बिन हर्र कूफ़े से निकला और कर्बला की तरफ़ चल पड़ा और उसने यह शेर पढ़ेः

یقول امیر قادر و ابن غادر
الا کنت قاتلت الحسین بن فاطمه

و نفسی علی خذلانه واعتزاله
و بیعة هذا الناکث العهد لائمه

فیا ندمی ان لا اکون نصرته
الاکل نفس لاتسدد نادمه

و انی لانی لم اکن من حماته
لذو حسرة ما ان تفارق لازمه

-    धोखेबाज़ कमांडर, और धोखेबाज़ का बेटा मुझसे कहता है कि तूने उस शहीद (फ़ातेमा के बेटे) से युद्ध नहीं किया?! हां मैं लज्जित हूँ कि क्यों उनकी सहायता नहीं कि, बल्कि हर वह व्यक्ति जो (समय पर) तौफ़ीक़ न पाय उसको पछतावा होगा।

-    मैं इस बात से कि उनके साथियों में से नहीं था अपने अंदर एक पछतावे का आभास करता हूँ जो कभी भी मुझसे अलग नहीं होगा।

-    ईश्वर उन लोगों की आत्मा को जिन्होंने उनकी सहायता के लिये कमर कस ली है (अपनी रहमत की) बारिश से सदैव तृप्त करे।

-    (अब) जब कि क़ब्रों और उनके स्थानों पर खड़ा हूँ मेरे आँसू बह रहे हैं और क़रीब है कि मेरा कलेजा फट जाए। (2)
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(1)    बिहारुल अनवार, जिल्द 68 पेज 130 हदीस 62
(2)    अलकामिल फ़ित्तारीख़ जिल्द 4, पेज 288 और 289, वक़अतुत तफ़, पेज 277