कर्बला इमाम ख़ुमैनी की नज़र में

कर्बला इमाम ख़ुमैनी की नज़र में
सय्यदुश्शोहदा हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने कुछ साथियों, क़रीबी रिश्तेदारों औऱ घर की औरतों के साथ यज़ीद के ख़िलाफ़ आंदोलन चलाया। चूँकि आपका आंदोलन अल्लाह के लिये था इस लिये उस दुष्ट की हुकूमत की बुनियादें (नींव) भी हिल गईं।

 

     सय्यदुश्शोहदा हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने कुछ साथियों, क़रीबी रिश्तेदारों औऱ घर की औरतों के साथ यज़ीद के ख़िलाफ़ आंदोलन चलाया। चूँकि आपका आंदोलन अल्लाह के लिये था इस लिये उस दुष्ट की हुकूमत की बुनियादें (नींव) भी हिल गईं।

     आप शहीद हो गए लेकिन हुकूमत की बुनियाद हिला दी, उस हुकूमत की बुनियाद जो इस्लाम को ताग़ूती और शैतानी बादशाहत में बदलना चाहती थी।

     सय्यदुश्शोहदा अलैहिस्सलाम नें अपने अमल से इस्लाम को बीमा कर दिया, वह महान हस्ती कि जिसका पालन पोषण, अल्लाह की वही की छाया में अंजाम पाया, वह महान हस्ती जो सय्यदे रसूल हज़रत मुहम्मद (स) औऱ सय्यदे औलिया हज़रत अली-ए-मुर्तज़ा अलैहिस्सलाम के घर हज़रते सिद्दीक़-ए-ताहेरा की गोद में पली बढ़ी, उसने क़ियाम किया, अपनी बेमिसाल क़ुर्बानी और इलाही आंदोलन द्वारा वह काम कर दिखाया जिससे ज़ालिमों के महेल धराशाई हो गए औऱ इस्लाम को नई ज़िंदगी मिल गई।

     सय्यदुश्शोहदा अलैहिस्सलाम नें अपनी पूरी उम्र और पूरी ज़िन्दगी बुराईयां मिटाने, ज़ुल्म की हुकूमत का तख़्ता पलटने और उन बुराईयों के ख़ात्मे में बिता दी जो हुकूमतों की तरफ़ से पैदा की गईं थीं। आपने अलैहिस्सलाम पूरी उम्र और पूरी ज़िन्दगी इसी काम में गुज़ारी कि इस ज़ुल्म की हुकूमत का सिलसिला रुके औऱ ख़त्म हो जाए, नेकियां (मारूफ़) पैदा हों, बुराईयां (मुनकेरात) मिट जाएं।

     कर्बला और सय्यदुश्शोहदा इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का नाम ज़िन्दा रखिये। इससे इस्लाम ज़िन्दा रहेगा। ईरान का इस्लामी इंक़ेलाब, कर्बला के महान इंक़ेलाब की एक किरण है।

     यह बातें जो हमारे जवानों के ज़हनों में डाली जा रही है कि मजलिस कब तक? नौहा व मातम कब तक? यह लोग नहीं जानते कि मजलिस क्या है औऱ इस बुनियाद की अब तक किस तरह रक्षा की गई है।

     यह लोग नहीं जानते औऱ इन्हें समझाया भी नहीं जा सकता। यह लोग नहीं जानते कि इस मजलिस और इस रोने से इन्सान बनते हैं, इन्सान बनाती हैं यह मजलिसे अज़ा, सय्यदुश्शोहदा की अज़ादारी ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ है, ज़ालिमों (ताग़ूतों) के ख़िलाफ़ आवाज़ है, मज़लूम के ख़िलाफ़ होने वाले ज़ुल्म को बयान करना है। सय्यदुश्शोहदा इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम नें मज़हब को बीमा किया है, अपने अमल से इस्लाम को बीमा किया है। अगर सय्यदुश्शोहदा अलैहिस्सलाम न होते तो उस शैतानी हुकूमत को और मज़बूत किया जाता औऱ लोग जाहेलियत की तरफ़ पलट जाते। आज अगर मैं औऱ आप मुसलमान भी होते तो ताग़ूती और शैतानी मुसलमान होते, हुसैनी मुसलमान नहीं। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम नें इस्लाम बचाया है।

     सय्यदुश्शोहदा इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत हालांकि हर तरह के नुक़सान से बढ़ कर थी लेकिन चूँकि आप जानते थे कि आपको क्या करना है, कहां जाना है, आपका मक़सद क्या है इसलिये आपने क़ुरबानी दी और शहीद हो गए। आपने अपने ख़ून के ज़रिये इस्लाम को ज़िन्दगी दी अब आप लोग इस्लाम पर अमल करके इसे बचाते रहिये।

     हम सबको पता होना चाहिये कि मुसलमानों में एकता का ज़रिया अइम्मए अतहार अलैहिस्सलाम ख़ास तौर पर सय्यदुश्शोहदा हज़रत अबू अब्दिल्लाहिल हुसैन अलैहिस्सलाम की मजलिसें और उनके नाम पर किये जाने वाले प्रोग्राम हैं (जिनकी एक सियासी हैसियत भी है)। इनके ज़रिये मुसलमानों ख़ास तौर पर शियों में एकता औऱ एक क़ौम होने का एहसास बाक़ी रहेगा।

     मुहर्रम कितनी मुसीबतों का महीना है, कैसे दिलों को कूट कूट कर इन्सान बनाने वाला महीना है। यह शहीदों के सरदार सय्यदुश्शोहदा इमाम हुसैन . के विशाल आंदोलन का महीना है जिन्होंने ज़ुल्म के मुक़ाबले में उठकर दुनिया वालों को सिखा दिया कि किस तरह अपने आपको कूट कूट कर इंसान बनाया जाता है। आपने सिखाया कि ज़ुल्म ख़त्म करने और ज़ालिम को मिटा डालने का तरीक़ा यह है कि हम ख़ुदाई बन जाएं और हमारा हर काम ख़ुदाई हो। यह हमेशा हमारी क़ौम के लिये इस्लाम की सबसे बड़ी शिक्षा रहेगी।

     मुहर्रम वह महीना है कि जिसमें मज़लूमों औऱ मुजाहिदों के सय्यदो सरदार (इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम) नें इस्लाम को ज़िन्दा किया औऱ ख़ुदा के दीन को भ्रष्ठ लोगों और बनी उमय्या की हुकूमत की साज़िशों से बचा लिया जिसने कि इसे मिटाने की ठान रखी थी। शुरू ही से इस्लाम को शहीदों और मुजाहिदों के ख़ून से सींचा गया औऱ तब इसकी कोंपलें खिलीं।

     मुहर्रम वह महीना है कि जिसमें इन्साफ़ ज़ुल्म के मुक़ाबले में और हक़ (सत्य) बातिल (असत्य) के मुक़ाबले में उठ खड़ा हुआ और यह साबित कर दिया कि इतिहास में हमेशा हक़ बातिल पर कामयाब हुआ है।

     शिया मज़हब के लिये मुहर्रम वह महीना है कि जिसमें क़ुर्बानी और ख़ून देने के नतीजे में कामयाबी हासिल हुई।

     इस्लाम के शुरू में इन्साफ़ और आज़ादी की नीव रखने वाले अल्लाह के महान पैग़म्बर स. के इस दुनिया से कूच करने के बाद बनी उमय्या अपनी गुमराही द्वारा इस्लाम को ख़त्म करना चाहते थे और इन्साफ़ व न्याय को अपने ज़ालिम हाथों से कुचलना चाहते थे कि सय्यदुश्शोहदा इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम नें कर्बला का महान आंदोलन छेड़ दिया।

     सारे नबीं समाज के सुधार के लिये आए थे, सय्यदुश्शोहदा इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का भी यही मक़सद था। आपने अपनी और अपने साथियों की क़ुरबानी पेश कर दी ताकि समाज में सुधार आए, समाज में इन्साफ़ का बोलबाला हो, यह था आपकी शहादत का मक़सद, अल्लाह के इन्साफ़ का प्रचलित करना।

     सय्यदुश्शोहदा इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम भी क़त्ल हो गए। आप इसलिये मैदान में नहीं गए कि सवाब मिल जाए। सवाब का आपको ज़्यादा ख़याल नहीं था। आप दीन को नजात देने के लिये, इस्लाम की तरक़्क़ी के लिये, इस्लाम को बचाने के लिये उठे।
सय्यदुश्शोहदा, रसूलुल्लाह स.अलैहिस्सलाम औऱ सारे नबियों की जिन्दगी का मक़सद ज़ुल्म के मुक़ाबले में इन्साफ़ की हुकूमत बनाना था।

     सय्यदुश्शोहदा नें देखा कि इस्लाम जा रहा है। आपका, यज़ीद के ख़िलाफ़ या अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम का मुआविया के ख़िलाफ़ उठ खड़े होने का मक़सद हुकूमत पर क़ब्ज़ा नहीं था। उनके सामनें पूरी दुनिया कोई हैसियत नहीं रखती। उनका मक़सद कोई मुल्क हासिल करना नहीं था बल्कि सय्यदुश्शोहदा अलैहिस्सलाम को इस्लाम और मुसलमानों के भविष्य की फ़िक्र थी। वह चाहते थे कि आने वाले कल में इस्लाम उनके जेहाद और क़ुर्बानी के नतीजे में लोगों में रेवाज पैदा करे, हमारा समाजी और सियासी सिस्टम इस्लामी हो। इस लिये आपने जंग की और क़ुर्बानी दी।

     आशूर के दिन जैसे जैसे सय्यदुश्शोहदा की शहादत का वक़्त क़रीब आता जा रहा था, आपका चेहरा निखरता जा रहा था। आपके जवान साथी शहीद होने में एक दूसरे पर पहल करना चाहते थे जबकि सबको पता था कि थोड़ी देर में सब शहीद हो जाएंगे। ऐसा इसलिये था कि उन्हें पता था कि वह कहां जा रहे हैं, समझ रहे थे कि वह वहां क्यों आए हैं, जानते थे कि वह वहां अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करने आए हैं, इस्लाम बचाने आए हैं।

     सय्यदुश्शोहदा देख रहे थे कि यह अल्लाह की राह में जेहाद है और क़ुर्बानियां अल्लाह के लिये हैं। जब अल्लाह के लिये हैं तो उनके चहीते उनसे बिछड़ नहीं रहे हैं बल्कि यह आख़ेरत के लिये ज़ख़ीरा (भंडार) बन रहे हैं।

     आशूर के दिन मज़लूमों के सय्यदो सरदार और क़ुरआन के चाहने वालों की शहादत इस्लाम और क़ुरआने करीम की हमेशा की ज़िन्दगी की शुरुआत थी। कर्बला वालों की शहादत और अल्लाह की गिरफ़्तारी ने यज़ीद के तख़्त की धज्जियां उड़ा दीं और सुफ़यानियों का नाम इतिहास के पन्नों से नोंच के फेंक दिया। यज़ीदी इस्लाम के नाम पर अपने ख़याल में वही को मिटाना चाहते थे, सय्यदुश्शोहदा अलैहिस्सलाम नें कर्बला का विशाल आंदोलन चलाया और अपनी और अपने साथियों की जान की क़ुर्बानी देकर इस्लाम और अद्ल व इन्साफ़ बचा लिया। बनी उमय्या की हुकूमत की चूलें हिलाकर उसे जड़ से उखाड़ फेंका।

     सय्यदुश्शोहदा अलैहिस्सलाम, आपके साथी और घर के लोग सब क़त्ल हो गए लेकिन इस्लाम को तरक़्क़ी दिलाई। इस्लाम को आगे ले जाने के लेहाज़ से पराजय नहीं हुई, तरक़्क़ी हुई यानी बनी उमय्या को हमेशा के लिये मात दे दी। सय्यदुश्शोहदा अलैहिस्सलाम ने अपना ख़ून दे कर एक भ्रष्ट हुकूमत को नाकाम किया।

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