जाने क्या है और क्यों मनाया जाता है मोहर्रम

जाने क्या है और क्यों मनाया जाता है मोहर्रम
जब यज़ीद तख़्ते हुकूमत पर बैठता है तो वह मदीने के गवर्नर वलीद को पत्र लिखता है कि इमाम हुसैन से मेरे लिए बैअत लो या फिर उनकी हत्या कर दो, लेकिन इमाम हुसैन किसी भी तरह यज़ीद की बैअत करने के लिए तैयार नहीं होते हैं और कहते हैं कि मेरे जैसे तुझ जैसे की बैअत

बुशरा अलवी

इस्लाम से पहले अरब के लोग इस महीने में युद्ध को वर्जित समझते थे और लड़ाई झगड़ा बंद कर दिया करते थे और यही कारण है कि उसी युग से इस महीने को यह नाम यानी मोहर्रमुल हराम दिया गया। (1) और मोहर्रम के महीने को चाँद पर आधारित इस्लामी कलंडर का पहला महीना माना जाता है। (2)

यहां पर किसी के ज़हर में यह प्रश्न उठ सकता है कि अरब लोग मोहर्रम के अतिरिक्त कुछ दूसरे महीनों में भी युद्ध को वर्जित मानते थे तो आख़िर उन महीनों को मोहर्रमु हराम क्यों नहीं कहा जाता है, तो इसका उत्तर यह है किः क्योंकि युद्ध का वर्जित होना इसी महीने से शुरू होता है इसी लिये इसे मोहर्रम यानी जिस महीने में युद्ध हराम है कहा जाता है।

इस महीने का शिया समुदाय में विशेष महत्व है और इस महीने को इमाम हुसैन (अ) और उनके कर्बला के सदैव बाक़ी रहने वाले आन्दोलन के साथ याद किया जाता है।

यह महीना इमाम हुसैन (अ) के वीर साथियों की याद, हज़रत ज़ैनब के समर्पण, इमाम सज्जाद (अ) और हुसैनी क़ाफ़ेले के क़ैदियों की याद दिलाता है। यह महीना इमाम सज्जाद के जागरुक करने वाले और यज़ीदियत के अहंकार को चकनाचूर करने वाले ख़ुत्बों और हज़रत ज़ैबन की शोला ज़बानी की याद दिलाता है।

यह महीना हबीब इबने मज़ाहिर की दृढ़ता और औन एवं जाफ़र की शहादत की याद दिलाता है।

बेशक यह महीना सत्य की असत्य पर जीत और हक़ की बातिल पर कामियाबी की याद दिलाता है।

यही वह महीना है कि जब मुआविया के शराबी, जुआरी, और अय्याश बेटे यज़ीद ने अपने आप को पैग़म्बर का ख़लीफ़ा बताते हुए पैग़म्बर के नवासे इमाम हुसैन (अ.) शहीद किया, कहानी कुछ इस प्रकार है कि जब मुआविया ने अपने युग में ही पैग़म्बरे इस्लाम के बड़े नवासे इमाम हसन के साथ की गई सुलह (संधि) की शर्तों को अनदेखा करते हुए अपने शराबी, जुआरी और अय्याश बेटे यज़ीद के लिए ख़िलाफ़त की प्रष्ठभूमि तैय्यार की और अपने युग में ही बहुत से लोगों से यज़ीद के लिए बैअत ले ली लेकिन इमाम हुसैन और कुछ दूसरे लोगों ने यज़ीद की बैअत करने से इनकार कर दिया, जब यज़ीद तख़्ते हुकूमत पर बैठता है तो वह मदीने के गवर्नर वलीद को पत्र लिखता है कि इमाम हुसैन से मेरे लिए बैअत लो या फिर उनकी हत्या कर दो, लेकिन इमाम हुसैन किसी भी तरह यज़ीद की बैअत करने के लिए तैयार नहीं होते हैं और कहते हैं कि मेरे जैसे तुझ जैसे की बैअत नहीं कर सकता है, उसके बाद आप मदीने को छोड़कर मक्के चले जाते हैं और लोगों को यज़ीद की बुराईयों के बारे में बताना शुरू करते हैं, लेकिन जब आप देखते हैं कि आप की जान मक्के में भी सुरक्षित नहीं है तो आप मक्के से भी कूच कर जाते हैं यज़ीद की सेना आप का पीछा करती रहती है और आख़िरकार आप दो मोहर्रम को करबला पहुँचते हैं, जहां एक के बाद एक यज़ीद की सेना बढ़ती जाती है और आप पर बैअत का दबाव डाला जाता है और कहा जाता है कि हुसैन या तो बैअत कर लो या फिर मरने के लिए तैयार हो जाओ, आप की औरतों और बच्चों पर पानी को बंद कर दिया जाता है छोटे छोटे बच्चे भूख और प्यास से तड़पते रहते हैं लेकिन यज़ीदियों को उन पर तरस नहीं आता है यहां तक की दस मोहर्रम आती है और यज़ीदी सेना इमाम हुसैन के छोटे से काफ़िले पर हमला कर देती है, इमाम हुसैन के साथी अपनी जान पैग़म्बर के नवासे पर निछावर कर देते हैं और जैसा जैसा दस मोहर्रम के दिन ढलता जाता है हुसैन के साथियों की संख्या कम होती जाती है यहां तक कि सांझ तक हुसैन एकेले रह जाते हैं और यज़ीदी सेना अत्याचार के साथ बर्बर रूप से इमाम हुसैन की हत्या कर देती है।

दस मोहर्रम के बाद हुसैन तो इस दुनिया से चले गए लेकिन आप की हत्या ने यज़ीदी हुकूमत की ऐसी चूले हिला दीं कि यज़ीद की अत्याचारी हुकूमत कुछ ही सालों में समाप्त हो गई।

अल्लामा एक़बाल ने क्या ख़ूब शेर कहा है

हद ही नहीं हुसैन तेरे इन्तेक़ाम की
लफ़्ज़े यज़ीद गाली से बदतर बना दिया

मासूमीन (अ) की नज़र में मोहर्रम

इमाम रज़ा (अ) से रिवायत हैः

जब मोहर्रम का महीना आ जाता था तो मेरे पिता हंसते दिखाई नहीं देते थे, गंम और दुख उनपर पहले दस दिन तक गालिब रहता था, और आशूरा का दिन, ग़म मुसीबत और उनके रोने का दिन था। (3)

इसी प्रकार इमाम रज़ा (अ) आशूरा के बारे में इस प्रकार फ़रमाते हैं:

जो भी आशूरा के दिन ग़मगीन और रोता हुआ रहे, ईश्वर क़यामत के दिन को उसके लिये प्रसन्नता और ख़ुशी का दिन बनाएगा। (4)

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1.    मिसबाहे कफ़अमी, पेज 509
2.    फ़रहंगे आशूरा, पेज 405
3.    वसाएलुश शिया, जिल्द 5, पेज 394, हदीस 8
4.    वसाएलुश शिया, जिल्द 5, पेज 394, हदीस 7

 

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