शेख़ निम्र की शहादत वाहबियों द्वारा शिया-सुन्नी मतभेदों को हवा देने की साज़िशः ओवैसी

ओवैसी
शैख़ निम्र और उनके साथ 47 लोगो को सऊदी सरकार द्वारा आतंकवाद के नाम पर फांसी की सजा देने का फैसला निहायत ही चोंका देने वाला और साथ ही अंतर राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानो के मसलकी इख़्तेलाफ को भड़काने वाली कार्यवाही है।


शैख़ अल निम्र और उनके साथ 47 लोगो को सऊदी सरकार द्वारा आतंकवाद के नाम पर फांसी की सजा देने का फैसला निहायत ही चोंका देने वाला और साथ ही अंतर राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानो के मसलकी इख़्तेलाफ को भड़काने वाली कार्यवाही है।

कुछ लोग इसे शिया सुन्नी लड़ाई का रूप देने में लगे है तो सऊदी अरब की सरकार सुन्नी रहनुमा बनने को बेताब दिख रही है। अगर हम इसे मसलक के चश्मे को उतार कर देखे तो सच्चाई कुछ और ही नज़र आएगी। असल में शैख़ अल निम्र के साथ ही सऊदी सरकार ने शैख़ उमर को भी फांसी दी है। शैख़ उमर अरब के सुन्नी आलिम थे। जिसका जिक्र पश्चिम मीडिया जान बुझ कर नहीं कर रहा है।

शैख़ उमर का कुसूर ये था कि वो रोज़ा ए रसूल पर सलातो सलाम और नात पढते थे। जिसकी वजह से उन्हें कई बार सऊदी सरकार ने गिरफ्तार कर जेल भेजा । और आखिर में आतंकवाद के नाम पर उनकी गर्दन ही काट ली। अब अगर इसके बाद भी कोई ये कहे कि ये शिया सुन्नी लड़ाई है तो वो झूठा ही कहलायेगा।

असल में ये लड़ाई सऊदी वहाबी विचार धारा से टकराव की है। अब अगर सऊदी सरकार के खिलाफ जो भी आवाज़ उठाएगा उसका मसलक चाहे कोई भी हो उसकी सजा सऊदी सरकार ने मौत ही रखी है। इसलिए हमें सऊदी सरकार की जुल्मो ज्यादती के खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए नाकि इसे शिया सुन्नी की लड़ाई का रूप देना चाहिए। सऊदी सरकार की मंशा है कि इसे शिया सुन्नी का रूप देकर दुनिया के सुन्नी ममालिक की सदारत करना है।

अब बात रही आतंकवाद कि तो तालिबान को सबसे पहले मान्यता देने वाला देश सऊदी अरब ही था। पूरी दुनिया ये बात जानती है कि आतंकवादी संगठन आईएस आईएस की विचार धारा सऊदी सरकार की वहाबी सलाफी विचारधारा से ही मेल खाती है और ये बात भी जग जाहिर है कि आईएस आईएस को भी सऊदी अरब से बड़ी फंडिंग होती है।

अब एक तरफ आतंकवाद की खुली सपोर्ट और दूसरी तरफ सरकार विरोधी जुलूसों में शामिल अपने ही देश के नागरिको को आतंकवादी बता कर फांसी देना सऊदी राज शाही की दोहरी पालिसी है।

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